अल्जाइमर को आमतौर पर बुढ़ापे की बीमारी माना जाता है, मगर ऐसा कतई नहीं है। अब युवा भी इसकी चपेट में आ रहे हैं। इसकी वजह एक जगह बैठकर घंटों स्क्रीन पर समय बिताना, शारीरिक गतिविधि कम करना, जंक फूड का अधिक सेवन आदि है। कुछ लोगों में विटामिन बी-12 की कमी, थायराइड या तनाव से दिक्कत होती है। मेडिकल कॉलेज के न्यूरोलॉजी विभाग की ओपीडी में हर माह 25 से 30 युवा आ रहे हैं।
धीरे-धीरे दिमाग को करती है प्रभावित
न्यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अरविंद कनकने ने बताया कि अल्जाइमर स्मृति भ्रम की बीमारी है, जो धीरे-धीरे दिमाग को प्रभावित करती है। इसके शुरुआती संकेत हाल की बात भूल जाना, फिर याद नहीं आने पर तनाव होना है। यदि समय पर उपचार नहीं कराया जाता है तो दिक्कत बढ़ने लगती है। सोचने-समझने, शब्द डबडबाना व सामान्य काम करने में दिक्कत होने लगती है। बार-बार एक ही सवाल पूछते हैं या बातें दोहराने लगते हैं। मूड अचानक बदलता है और चिंता, डर या बेवजह शक होने लगता है। कभी-कभी ये लोग वे चीजें देख या सुन सकते हैं, जो असल में नहीं है।
इन खेलों से मिलता है आराम
उन्होंने बताया कि अक्सर लोग याददाश्त की कमजोरी को बुढ़ापे का हिस्सा मानते हैं, मगर ऐसा नहीं है। इसका समय रहते उपचार जरूरी होता है, अन्यथा दिक्कत बढ़ जाती है। इसके जोखिम को व्यायाम, शारीरिक गतिविधि, संतुलित आहार आदि से कम किया जा सकता है। पूरी नींद, नियंत्रित बीपी व सक्रिय दिनचर्या से दिमाग स्वस्थ रहता है। वहीं, युवाओं में घंटों स्क्रीन पर बिताने, जंक फूड ज्यादा खाने, नशा करने, अनियमित दिनचर्या, खानपान में बदलाव, व्यायाम की कमी आदि से यह दिक्कत होती है। वहीं, जिला अस्पताल के मनोरोग विभाग की डॉ. सिकाफा जाफरीन का कहना है कि समाज से दूरी बनाने, डिप्रेशन, शिथिल दिनचर्या की वजह से यह दिक्कत होती है। इससे बचने के लिए रोज एक नया काम करें। सुडूको या शतरंज जैसे खेल से काफी हद तक इससे बचा जा सकता है।
यदि कोई पीड़ित है तो ये करें
धैर्य से उसकी बात सुनें और बोलें। डांट-फटकार न करें। निश्चित दिनचर्या बनाएं ताकि रोगी को घबराहट न हो। फिसलन की जगह जाने न दें। कमरों में पूरी रोशनी रखें प्यार, अपनापन दिखाएं। जरूरत हो तो हाथ पकड़ें या गले लगाएं।संगीत सुनने, पहेलियां हल करने, ड्राइंग या टहलने के लिए प्रेरित करें।