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कौन करेगा इनका पिंडदान, कल किसी के अपने थे, आज पन्नों में दफन ‘अज्ञात’ हैं

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झांसी। ऐसी मान्यता है कि मरने के बाद जिस व्यक्ति का विधि-विधान से क्रिया कर्म और पिंडदान नहीं किया जाता है उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती। इन दिनों पितृ पक्ष चल रहे हैं। घरों में लोग अपने परिवार के मृत लोगों व पूर्वजों का श्राद्ध और पिंडदान कर उनकी आत्मा की शांति के लिए कामना कर रहे हैं। पंडितों को भोजन कराया जा रहा। कौओं, कुत्तों और चीटियों को भी भोजन दिया जा रहा है, लेकिन उन व्यक्तियों का क्या, जिनको मरने के बाद कोई पहचान ही नहीं मिल रही। उनका श्राद्ध और पिंडदान कब और कौन करेगा ? ये ‘अज्ञात’ लोग पुलिस के दस्तावेजों में बंद अपनी पहचान की बांट जोह रहे हैं जो कल तक किसी के अपने थे।
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ऐसा नहीं है कि इनकी कभी कोई पहचान नहीं थी। ये भी किसी के बेटे-बेटी, भाई-बहन व सगे संबंधी रहे होंगे, लेकिन मरने के बाद इनकी पहचान बताने वाला कोई भी सामने नहीं आ रहा। ये वह लोग हैं जो ट्रेन एक्सीडेंट, सड़क हादसे, बीमारी या किसी अन्य वजह से मरे और अब तक इनकी शिनाख्त नहीं हो सकी। पुलिस ने जैसे-तैसे नियमानुसार इनका अंतिम संस्कार तो कर दिया लेकिन पुलिस लाइन के जीडी कार्यालय में पन्नों में दफन हर एक ‘अज्ञात’ शख्स की आत्मा शायद यही कामना कर रही है कि काश उन्हें उनकी पहचान मिल जाए और कोई उनका भी तर्पण करे। जीडी कार्यालय में एक जनवरी 2021 से लेकर 19 सितंबर 2021 तक 95 ऐसे लोगों (महिला, पुरुष, भ्रूण) की मौत हुई है, जिनकी कोई पहचान नहीं हो पाई है। यह सभी मामले ‘अज्ञात’ में दर्ज पड़े अपनों के इंतजार में हैं...। पुलिस भी कह रही कि अब तक इनकी शिनाख्त के लिए कोई अपना नहीं आया।
ये हैं अज्ञात में दर्ज लोगों की गिनती
-जनवरी 07
-फरवरी 03
-मार्च 07
-अप्रैल 16
-मई 13
-जून 09
-जुलाई 15
-अगस्त 15
-सितंबर में अब तक 10
महीनों से विसर्जन के लिए तड़प रहीं आत्माएं
झांसी। बदल रहे समाज की यह कैसी विडंबना है कि जहां कई बच्चे अपने माता-पिता को घर से बेघर कर वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर कर रहे हैं। वहीं, कोई अपना परिवार के किसी सदस्य के मरने के बाद उसका अस्थि विसर्जन करना ही भूल गया। झांसी में बड़ा गांव गेट बाहर स्थित मुक्तिधाम में पिछले तीन वर्ष से एक अस्थि कलश (मृतक के अंतिम संस्कार के बाद चुने हुए अवशेष व फूल) रखा है, लेकिन इसे अब तक कोई भी लेने नहीं आया। इसी तरह तकरीबन ढाई महीने से एक और कलश भी रखा हुआ है, इसे भी लेने अब तक कोई नहीं पहुंचा। यह दोनों अस्थि कलश मुक्तिधाम में अलग-अलग तालाबंद लॉकरों में अंतिम संस्कार के अगले दिन उनके परिजनों द्वारा रखवाए गए थे, लेकिन अब इन्हें कोई पूछने वाला नहीं है। मुक्तिधाम में देखरेख वाली महिला रीना ने बताया कि ऐसा कई बार हुआ है कि अंतिम संस्कार के बाद लोग कई-कई दिनों तक कलश लेने नहीं आते, जबकि मुक्तिधाम में आए लोगों ने कहा कि मरने वाली की आत्मा अस्थि विसर्जन, श्राद्ध और पिंडदान के बाद ही तृप्त होती है। ये आत्माएं तो महीनों से विसर्जन के लिए तड़प रहीं...।
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