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गंदगी की परत हटी तो सामने आई इतिहास की समृद्ध विरासत

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झांसी। पुराने शहर की घनी आबादी के बीचोंबीच स्थित प्राचीन जल स्रोत पानी वाली धर्मशाला (तालाब) की सफाई का काम अंतिम दौर में है। सैकड़ों सालों तक पानी और गंदगी के गर्त में दबी रही मराठा काल की निर्माण शैली लोगों को विस्मित करती है। धर्मशाला के अंदरूनी हिस्से का प्लास्टर अब भी पूरी तरह से सुरक्षित है और इसकी बनावट में भी कोई अंतर नहीं आया है। धर्मशाला मराठा काल की समृद्ध विरासत है।
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पानी वाली धर्मशाला (तालाब) का निर्माण सत्रहवीं शताब्दी में मराठा शासन काल में महारानी लक्ष्मीबाई के पूर्वजों ने कराया था। जबकि, इससे पहले यहां कुएं हुआ करते थे। निर्माण के बाद अठारहवीं शताब्दी में महारानी लक्ष्मीबाई ने अपने शासन काल में इस जल स्रोत का जीर्णोद्धार कराया था। तीन दशक पहले तक दिन भर धर्मशाला में तैराकों का जमावड़ा रहता था। लेकिन, लगातार अनदेखी के कारण ये बदहाल हो गई। पानी की ऊपरी सतह जलकुंभी से पट गई। जबकि, इसके नीचे नालों का गंदा पानी जमा हो गया।
अब इसका चयन स्मार्ट सिटी के तहत हुआ है। इसलिए धर्मशाला का सौंदर्यीकरण किया जा रहा है। इसके लिए इसमें जमा गंदगी को साफ करने का काम चल रहा है, जो अंतिम दौर में है। गंदगी साफ होते ही धर्मशाला का पुराना स्वरूप उभरकर सामने आ गया है। इसकी तलहटी तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हुईं हैं। धर्मशाला के चारों ओर एक-एक फुट से अधिक ऊंची आठ लंबी-लंबी सीढ़ियां हैं। इसके बाद इन सीढ़ियों से सटकर और नीचे जाने के लिए जगह-जगह नौ सीढ़ियां बनी हुई हैं, जो दो तरफ खुलती हैं। तलहटी से सटकर कई आले बने हुए हैं, जो तालाब में नहाने के बाद कपड़े बदलने के लिए उपयोगी थे। जबकि, किनारे अलग से महिलाओं के स्नान के लिए कुंड हैं, जिसके चारों ओर दीवार है। लगभग तीन सौ सालों तक पानी में डूबे रहने के बाद भी भीतरी सतह का प्लास्टर एकदम सुरक्षित है। बनावट में भी कोई फर्क नहीं आया है। जो मराठाकाल की उत्कृष्ट निर्माण शैली का अद्भुत उदाहरण है।
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धरोहर अतिक्रमण की चपेट में
झांसी। पानी वाली धर्मशाला के इर्दगिर्द कई स्थानों पर अतिक्रमण कर लिया गया है, जिससे ऊपर से इसके कुछ हिस्से का आकार बेतरतीब हो गया है। इसके अलावा धर्मशाला तक पहुंचने का रास्ता भी बेहद संकरा है। सौंदर्यीकरण के बाद संकरे रास्ते से पर्यटकों को धर्मशाला तक लाना चुनौती बना रहेगा।
ऐसे होगी स्मार्ट
झांसी। स्मार्ट सिटी के तहत धर्मशाला के सौंदर्यीकरण पर पांच करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं। इसकी सफाई कर इसमें साफ पानी एकत्र किया जाएगा। बीचोंबीच फव्वारा लगाया जाएगा। पानी का ऑक्सीजन लेवल बना रहे, इसके भी इंतजाम किए जाएंगे। चारों ओर जाली लगाई जाएगी, ताकि लोग पूजन सामग्री या गंदगी इसमें न फेंक सकें। इसके अलावा चारों ओर लाइटिंग की जाएगी। बैंच लगाई जाएंगी। चारों कोनों पर योगा शेड बनाए जाएंगे। आसपास के भवनों की बाहरी दीवारों का रंग भी एक समान करने की योजना है।
पानी वाली धर्मशाला इतिहास की अनूठी विरासत है। इसका निर्माण मराठा काल में हुआ था। महारानी के पूर्वज नारोशंकर ने इसका निर्माण कराया था। इसके पास ही उन्होंने टकसाल भी बनवाई थी, जहां झांसी राज्य की मुद्रा तैयार होती थी। भावी पीढ़ी के लिए इतिहास की इस विरासत का संरक्षण बेहद जरूरी है।
- हरगोविंद कुशवाहा, उपाध्यक्ष - अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान
पानी वाली धर्मशाला बुंदेलखंड के इतिहास के महत्वपूर्ण अवशेषों में से एक है। मराठा काल की कलाशैली इसमें नजर आती है। इसकी तलहटी में कई कुएं हैं, जो पानी का बेहतरीन स्रोत हैं। महारानी लक्ष्मीबाई ने इसका जीर्णोद्धार कराया था। पहले इसके पास एक गंगा मंदिर भी था, जो अब गुम हो गया है।
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- मुकुंद मेहरोत्रा, अध्यक्ष - ललित कला अकादमी
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