महरौनी। श्री रामयश कीर्तन मंडली के तत्वावधान में चल रहे रामलीला महोत्सव के आठवें दिन सुमंत विलाप, दशरथ मरण, भरत मिलाप और जयंत की कुटिलता के प्रसंगों का मंचन हुआ।
लीला मंचन में सुमंत लौटकर महल में आकर राजा दशरथ को सारा समाचार सुनाते हैं कि किस तरह वन में कठिनाइयों का सामना करते हुए राम, लक्ष्मण और सीता आगे बढ़ते जा रहे हैं। यह सुनकर राजा दशरथ अधीर हो जाते हैं और करुण विलाप करते हैं।
वह राम राम पुकारते हुए पुत्र वियोग में अपने प्राण तज देते हैं। राजा के मरणोपरांत गुरु वशिष्ठ दूतों के माध्यम से भरत और शत्रुघ्न को उनके ननिहाल से अयोध्या वापस बुलवाते हैं। जब भरत पिता की मौत और राम के वनगमन का समाचार सुनते हैं तो शोक में डूब जाते हैं।
जंगल में निषादराज भरत को श्रीराम का पता बताते हैं। चित्रकूट में राम और भरत का मिलाप होता है। भरत से पिता की मौत का समाचार सुनकर राम, लक्ष्मण और सीता शोक में डूब गए।
भरत ने राम के समक्ष अयोध्या लौट चलने की विनय की, लेकिन राम ने अपने पिता की आज्ञानुसार 14 वर्ष से पहले अयोध्या लौटने से मना कर दिया। तब राम की चरण पादुकाएं अपने सिर पर रखकर भरत अयोध्या लौटते हैं। बाबूलाल नायक, श्याम स्वरूप पालीवाल, रामेश्वर रिछारिया, कृष्णस्वरूप पटैरिया, रामेश्वर सोनी, आशाराम तिवारी, महेंद्र सिंह, दुष्यंत बडौनिया, संजय पांडेय आदि मौजूद रहे।