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च्यवन ऋषि ने इसी जंगल में बनाया था च्यवनप्राश, लकड़ी तस्करों ने नष्ट कर दिया सबकुछ

Fri, 25 Oct 2019 01:25 PM IST
Prachi Priyam न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झांसी
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च्यवनप्राश
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समुद्र मंथन के दौरान अमृत-कलश के साथ प्रकट हुए आयु के देवता भगवान धनवंतरि की आज यानी शुक्रवार को जयंती है। दूसरी ओर आज धनतेरस भी है जो खुशहाली और स्वास्थ्य का प्रतीक है। धनतेरस पर धन और समृद्धि के बारे में तो आपने बहुत कुछ सुना और जाना होगा, लेकिन भगवान धनवंतरि की जयंति पर आज हम आपको आयुर्वेद की सबसे जानी-मानी औषधि, च्यवनप्राश के बारे में बता रहे हैं। च्यवनप्राश हम में से ज्यादातर लोगों के घर में रखा होता है, लेकिन बहुत कम लोग हैं जिन्हें इसके इतिहास के बारे में पता होगा। हम आपको बता रहे हैं आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में शरीर में स्फूर्ति प्रदान करने वाले टॉनिक च्यवनप्राश को किसने और कहां बनाया था?

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बुंदेलखंड का ललितपुर जिला वर्षों से औषधीय वनस्पतियों के लिए विख्यात रहा है। यही कारण है कि च्यवन ऋषि ने यहां पर अपना आश्रम बनाकर औषधियों को विश्वभर में प्रचलित किया। उन्होंने बुंदेलखंड की धरती पर ही च्यवनप्राश बनाया था। च्यवन ऋषि की धरती तहसील पाली से सात किलोमीटर दूर है। 

ग्राम बंट के जंगली क्षेत्र में च्यवन ऋषि का आश्रम था। आज भी यह क्षेत्र घने जंगल में तब्दील है। यहां पर अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। जिले की भौगोलिक स्थित ऐसी है कि पूरा क्षेत्र जड़ी-बूटियों से भरा पड़ा है। खासकर गौना वन रेंज और मड़ावरा के जंगल में बहुतायत में जड़ी बूटियां पाई जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि च्यवन ऋषि ने बुंदेलखंड में ही च्यवनप्राश बनाया था। च्यवनप्राश का उपयोग करोड़ों लोग स्फूर्ति प्रदान करने वाले टॉनिक के रूप में करते हैं। 

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प्रमुख जड़ी बूटियां

शंखपुष्पी, अश्वगंधा, ब्राह्मी, सफेद मूसली, पलाश, भूमि आंवला, खैर के बीज, गाद, कसीटा, धावड़ा, कमरकस जड़ी- बूटी प्रमुख हैं। वर्ष 2000 में केंद्र सरकार ने औषधीय पौधों जिनमें सफेद मूसली, लेमन, मेंथा, पाल्मारोजा, अश्वगंधा आदि को संरक्षित करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री की अध्यक्षता में राष्ट्रीय औषधीय वनस्पति समिति का गठन किया था। 

इसके बाद समिति ने 32 औषधियों के विकास के लिए चिह्नित किया था। इसमें आंवला, अशोक, अश्वगंधा, अतीस, बेल, भूमि अम्लाकी, ब्राह्मी, चंदन, गुग्गल, पत्थरचुर, पिप्पली, दारुहल्दी, इसबगोल, जटामांसी, चिरायता, कालमेघ, कोकुम, कथ, कुटकी, मुलेठी, सफेद मूसली, केसर, सर्पगंधा, शतावरी, तुलसी, वत्सनाम, मकोय प्रजाति को संरक्षित करने की योजना तैयार की। चंदन के वन ब्लॉक बार क्षेत्र में पाए जाते थे, लेकिन लकड़ी के तस्करों ने इन जंगलों को नष्ट कर दिया। 
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नहीं पक पाता है फल

यहां पर बेल एवं आंवले का दोहन समय से पहले कर लिया जाता है। बेल को पकने नहीं दिया जाता है। आंवला को परिपक्व नहीं होने दिया जाता। जंगल मे चिरौंजी फल भरपूर है, किंतु इसको भी पकने नहीं दिया जाता। फल पके तो बीज गिरेगा और फिर पौधा तैयार होगा, किंतु ऐसा नहीं हो पा रहा है। जो बेहद चिंताजनक है। दरअसल, औषधि बनाने वाले इन फलों को तोड़कर ले जाते हैं।     

दस साल पहले थी सफेद मूसली की भरमार

ग्राम डोंगरा खुर्द के जुग्गा सहरिया ने बताया कि दस साल पहले पर्याप्त जड़ी- बूटियां मिल जाती थीं, लेकिन अब नष्ट होती जा रही हैं। इसका प्रमुख कारण अंधाधुंध तरीके से दोहन है। दस साल पहले सफेद मूसली जंगलों में भरपूर मिलती थी, जिससे सहरिया परिवारों की गुजर-बसर चलती थी। लेकिन, अब बहुत कम हो गई है। इसके दाम भी बहुत कम मिल पा रहे हैं।

क्षेत्रीय आयुर्वेदिक व यूनानी चिकित्साधिकारी डॉ. चारूशीला शरण ने बताया कि बुंदेलखंड में बहुतायत में जड़ी- बूटियां पाई जाती हैं। आयुर्वेद का आधार इन्हीं जड़ी- बूटियों में निहित है। च्यवनप्राश बुंदेलखंड में तैयार हुआ, इसके प्रमाण तो नहीं हैं। लेकिन, च्यवन ऋषि का आश्रम और जड़ी- बूटी बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण माना जाता है कि च्यवनप्राश का निर्माण बुंदेलखंड में ही हुआ था।
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