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पुष्पेंद्र यादव एनकाउंटर केस: माननीयों के पड़ने लगे कदम, राजनीति का तवा गरम

Wed, 09 Oct 2019 03:20 AM IST
झांसी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झांसी
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पुष्पेंद्र यादव के गांव में आते राजनेता। - फोटो : अमर उजाला
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पुलिस मुठभेड़ में पुष्पेंद्र यादव की मौत के बाद से करगुवां खुर्द गांव सियासतदारों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है। चिता की राख बेशक ठंडी न हुई हो, राजनीति का तवा गरम है। राजनीतिक दलों के स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का आना शुरू हो गया है। मंगलवार को प्रसपा अध्यक्ष शिवपाल यादव के बेटे आदित्य यादव और वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का एलान करने वाले तेज बहादुर सिंह यादव ने विरोध दर्ज कराया।

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कुछ नेताओं को बुधवार को भी आना है। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का नाम भी शामिल है। प्राकृतिक चुनौतियों से लेकर राजनीतिक उपेक्षा का शिकार क्षेत्र के बाशिंदे जानना चाह रहे हैं कि पानी, सिंचाई की बुनियादी समस्याओं से लेकर रोजगार के लिए पलायन, सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर जनता के कंधे से कंधा न मिलाने वाले क्या पुष्पेंद्र के बहाने अपनी राजनीतिक जमीन सींचने आ रहे हैं।

राजनीतिक निष्ठा के हिसाब से नेताओं के अपने-अपने तर्क हैं। प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि क्या यह जाति विशेष को लुभाने की राजनीति है। यदि नहीं, तो क्या ये नेता स्थानीय स्तर के ऐसे अन्य मामलों में पिछड़ा वर्ग की अन्य जातियों या अल्पसंख्यक समाज के दर्द को साझा करने आए। जबकि पुलिस पर अत्याचार और अनदेखी के आरोप लगातार लगते रहे हैं।
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लगभग सभी सरकारों में पुलिस के एनकाउंटर होते रहे हैं। इन पर प्रश्न भी खड़े हुए हैं। कई बार ये फर्जी भी साबित हुए हैं। इस सच के साथ ही बुंदेलखंड में अवैध खनन भी एक घिनौनी हकीकत है। सरकार कोई भी रही हो यह अवैध धंधा डंके की चोट पर चल रहा है। सत्ता, माफिया, पुलिस के गठजोड़ का यह एक बड़ा उदाहरण है। पुष्पेंद्र मुठभेड़ की पृष्ठभूमि में भी खनन का काला कारोबार है। इसकी कालिख में कौन कितना लिप्त है यह जांच का मामला है। किसी राजनीतिक दल ने खनन के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद की हो ऐसा मामला सामने नहीं आता।

जातीय और सामाजिक भेदभाव भी क्षेत्र की बड़ी समस्या है। ललितपुर के मड़ावरा के एक प्राथमिक विद्यालय में एक दलित महिला की नियुक्ति पांच साल पहले रसोइये के रूप में हुई। लेकिन उसने तब से एक ही बार खाना बनाया। क्योंकि उसके हाथ से बना खाना कोई नहीं खाता। उसने इस हकीकत को स्वीकार लिया। नौकरी तो करनी थी लिहाजा उसने स्कूल में ही साफ-सफाई का काम संभाल लिया। कोई राजनेता यह भेदभाव खत्म करने के लिए सड़क पर नहीं उतरा।

यही हाल अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यकों के साथ आए दिन होने वाली अनदेखी, अनसुनी में भी है। बुंदेलखंड की समस्याएं भले ही राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुर्खियां बनती हों पर उनके समाधान के लिए यही जिम्मेदार नेता कभी एक मंच पर नहीं दिखे। यूनाइटेड नेशन्स डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) ने नीति आयोग के साथ बुंदेलखंड मानव विकास पर अपनी रिपोर्ट में तमाम विषयों पर चिंता जताई।

नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के 8 मई 2016 को लिखे पत्र में इनका हवाला है। इसमें बुंदेलखंड की स्वास्थ्य, शिक्षा क्षेत्र में बुनियादी सुविधाओं समेत आर्थिक, सामाजिक भेदभाव, पानी की परेशानी आदि मुद्दों पर चिंता जताई गई थी। इन समस्याओं पर वृहद स्तर या गांव विशेष को लेकर राजनीतिक पहल या आंदोलन इन दिनों नहीं दिखा है।

राजनीतिक विश्लेषक, वीजी श्रीवास्तव का कहना है कि राजनीतिक दल और राजनेता अपने हितों को भुनाने के लिए जनता के मिजाज का फायदा उठाने से नहीं चूकते। छोटे-बड़े हर दल का यह हथकंडा है। राजनेताओं को छोटे स्वार्थों से उठकर विकास की ओर देखना होगा। विकास के लिए विजन के साथ सभी को आगे आना होगा। उस पर अमल करना होगा
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