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पढ़ाई में लगाई लगन, मुश्किलों को मात देकर बेटियों ने पाया स्वर्ण

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झांसी। मेहनत और लगन से की गई पढ़ाई से सफलता हमेशा मिलती है। मुश्किलें कितनी भी हों, लेकिन उनको मात देकर आगे बढ़ने के लिए कड़ा परिश्रम करना पड़ता है। कुछ ऐसे ही अपनी मुश्किलों को छोड़कर महानगर की तीन बेटियों ने स्वर्ण पदक पाया है। बुंदेलखंड विवि में हुए दीक्षांत समारोह में मजूदर, टेलर और वेल्डर पिता की इन बेटियों ने कुलाधिपति स्वर्ण पदक पाकर मिसाल कायम की है। हालात यह थे कि किसी के पास किताब खरीदने तक के पैसे नहीं थे, तो किसी के मां-बाप ने खुद के खर्चों में कटौती करके बेटी को पढ़ाया।
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माता-पिता ने खत्म कर दिए अनावश्यक खर्च
कुलाधिपति स्वर्ण पदक पाने वाली भट्टागांव के पास खिरकपट्टी निवासी महिला महाविद्यालय की छात्रा आरती कुमारी ने बताया कि उनके पिता दिहाड़ी मजदूर हैं। चार भाई-बहनों में दूसरे नंबर की आरती के माता-पिता ने बड़ी मुश्किल दौर से गुजर कर उसे उच्च शिक्षित बनाया है। माता-पिता ने उसे पढ़ाने के लिए अपने सारे अनावश्यक खर्च कम कर दिए। मां तो नई साड़ी तक नहीं खरीदती थीं। कॉलेज के शिक्षकों ने भी काफी सहयोग किया। वह रोजाना पांच घंटे पढ़ाई करती थीं। अब सिविल सर्विस में जाने की इच्छा है।
सेल्फ स्टडी से पाया मुकाम
छनियापुरा की रुपिका रायकवार भी महिला डिग्री कॉलेज की छात्रा हैं। बताया कि उनके पिता टेलर हैं। कभी सोचा नहीं था स्वर्ण पदक मिलेगा। हमेशा सेल्फ स्टडी की। कभी कोचिंग नहीं की। बदले पैटर्न पर इस बार परीक्षा हुई लेकिन उनके लिए काफी मददगार रही। कहा कि प्रतियोगी परीक्षाओं में भी वैकल्पिक प्रश्न आते हैं। ऐसे में शुरू से ही इसकी आदत पड़ना अच्छी बात है। सफलता का राज बताते हुए कहा कि ज्यादा घंटे तक पढ़ने से कुछ नहीं होता। बल्कि, जितनी देर पढ़ो, पूरा मन लगाकर पढ़ने से सफलता मिलती है। वह भी सिविल सर्विसेज में जाना चाहती हैं।
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माता-पिता की प्रेरणा से मिली सफलता
दतिया गेट की सबीहा ने बताया कि उनके पिता वेल्डिंग करते हैं। परिजनों ने हमेशा पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। लॉकडाउन में काम-धंधा बंद हो जाने की वजह से आर्थिक स्थिति गड़बड़ा गई तो किताब खरीदने के पैसे नहीं रहे। स्कूल के शिक्षकों ने किताब के नोट्स की पीडीएफ बनाकर दी। वह रोजाना तीन-चार घंटे ही पढ़ती थीं। सिविल सर्विस में जाकर कॅरियर बनाना चाहती हैं।
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