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एलएचबी - सीटों में होगा इजाफा, यात्रियों को मिलेगी राहत

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झांसी। झांसी से गुजरने वाली तुलसी एक्सप्रेस यात्रियों के लिए मुफीद ट्रेन मानी जाती है। एलएचबी कोच लगने के बाद सीटों में इजाफा होन के साथ ही यात्रियों को राहत मिलेगी, क्योेंकि मुंबई जाने वाली ट्रेनों में सीट पाने के लिए मारामारी रहती है।
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मुंबई जाने के लिए झांसी स्टेशन से पुष्पक एक्सप्रेस, लखनऊ - लोकमान्य तिलक एक्सप्रेस, दादर अमृतसर एक्सप्रेस, कुशीनगर एक्सप्रेस, गोरखपुर - लोकमान्य तिलक एक्सप्रेस, पंजाब मेल, मंगला एक्सप्रेस, झांसी बांद्रा एक्सप्रेस व गोरखपुर - लोकमान्य तिलक एक्सप्रेस समेत तुलसी एक्सप्रेस से यात्रियों का आवागमन होता है। ऐसे में मुंबई जाने के लिए तुलसी एक्सप्रेस की डिमांड अधिक है। यह ट्रेन सप्ताह में दो दिन रात के समय झांसी से निकलती है। वर्तमान में ट्रेन में कुल बर्थों की संख्या 1238 है, लेकिन 10 सितंबर के बाद से इसमें स्लीपर, एसी थ्री व एसी टू की कुल 1300 बर्थ हो जाएंगी, इसका फायदा यात्रियों को भी मिलेगा। एलएचबी रैक लगने के बाद जेनरेटर के दो, समान्य श्रेणी के तीन, स्लीपर श्रेणी के 12, एसी टू का एक व एसी थ्री के कुल चार कोच होंगे।
वर्तमान में मंडल से गुजरने वाली कई ट्रेनों में आईसीएफ कोच लगे हैं, जो अधिक स्पीड में होने वाली दुर्घटनाओं को सहने की क्षमता नहीं रखते हैं। शताब्दी व राजधानी एक्सप्रेस की तरह आईसीएफ के पुराने कोचों को आधुनिक कर उनकी कपलिंग को बदला जा रहा है। आईसीएफ डिब्बों की कपलिंग के बीच एक लोहे की रॉड डाल दी जाती है। एलएचबी की कपलिंग में डिब्बों के एक-दूसरे पर चढ़ने की संभावना कम होती है।
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लंबाई के साथ बर्थ भी बढ़ीं
सामान्य कोच 22 मीटर लंबा होता है। एलएचबी कोच 23.54 मीटर लंबा है। इसमें सामान्य स्लीपर क्लास की 72 से बढ़ाकर 80, एसी थ्री टायर में 64 से 72 व टू टीयर में 46 से 52 सीटें हो गई हैं।
एलएचबी कोच की विशेषताएं
हादसों के दौरान यह बगल के कोच में नहीं घुसते। टकराव या पटरी से उतरने के दौरान दोहरी बफर सिस्टम के बजाय एक-दूसरे कोच पर नहीं चढ़ते। मौजूदा में चल रहे पारंपरिक आईसीएफ कोचों की तुलना में एलएचबी कोच 1.7 मीटर ज्यादा लंबे हैं। इसमें बैठने की क्षमता ज्यादा है। रखरखाव (मेंटेनेंस) कम होता है। तेज गति पर कुशल ब्रेकिंग के लिए उन्नत वायवीय डिस्क ब्रेक सिस्टम लगाया गया है। कोच मॉड्यूलर इंटीरियर से लैस है। पुराने आईसीएफ कोचों की तुलना में एलएचबी कोचों का शोर 40 फीसदी कम है। एयर कंडीशनिंग उच्च क्षमता की है।
टक्कर झेलने में सक्षम
जर्मनी की कंपनी के नाम पर एलएचबी कोच का नाम पड़ा। जर्मनी से करार के बाद यह तकनीक भारत को मिली और रेल कोच फैक्ट्री कपूरथला में वर्ष 2002 से इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ। एलएचबी कोच एंटी टेलिस्कोपिक तकनीक से बनाए गए हैं। कोच के टॉयलेट वाले हिस्से को बीच के हिस्से की तुलना में कमजोर बनाया गया है। टक्कर होने पर पहला झटका टायलेट वाले भाग को लगेगा और इस हिस्से को क्रश करने के बाद दबाव खत्म हो जाएगा। इससे ट्रेन के पटरी से उतरने या पलटने का खतरा नहीं रहता है। एलएचबी कोच में डिस्क ब्रेक लगाए गए हैं, ताकि 120 की रफ्तार में भी ब्रेक लगाने पर 500 से 700 मीटर पर ट्रेन ठहर सके।
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