झांसी। पं. परमानंद झांसी वाले के नाम से देश में पहचान रखने वाले बुंदेलखंड के इस क्रांतिकारी से अंग्रेज सरकार की चूलें हिलती थीं। 6 जून 1889 को बुंदेलखंड की राठ तहसील के ग्राम सिकरोधा में जन्मे पंडित परमानंद सोलह वर्ष की उम्र में झांसी आ गए थे तथा यहीं से क्रांतिकारी गतिविधियों का संचालन करने लगे। उनकी टोली ने तय किया कि आजादी सिर्फ सशस्त्र क्रांति से ही संभव है। पर, सवाल यह था कि हथियार लाएं कहा से। क्रांतिकारियों के दल ने यह जिम्मा पं. परमानंद को सौंपा तथा उन्हें अमेरिका से शस्त्र लाने के साथ ही इंग्लैंड सरकार की सेना के गुप्त नक्शे लाने का काम भी सौंपा। वे एक जहाज में छह हजार राइफलें गोले और हथियार लेकर लौटे तथा सशस्त्र क्रांति की तैयारी ही कर रहे थे कि उन्हीं के एक गद्दार साथी ने ब्रिटिश सरकार को सूचना दे दी, जिससे क्रांतिकारियों की टोली पकड़ी गई, इसमें सात लोगों को फांसी की सजा दी गई थी तथा पं. परमानंद को आजन्म कारावास की सजा सुर्नाकर कालेपानी जेल भेज दिया था। इसके पहले पं. परमानंद ने सिंगापुर में जाकर वहां इतना क्रांतिकारी भाषण दिया था कि क्रांतिकारियों ने 600 अंग्रेज सैनिकों की हत्या करके यूनियन जेट उतारकर भारतीय तिरंग फहरा दिया था।
सरदार करतार ने कर दी थी मुखबिरी
शिक्षाविद् व साहित्यकार पं. राधारमन तिवारी बताते हैं कि पं. परमानंद 1914 में तोसामारु जहाज से अपने शस्त्र क्रांति के सपने को पूरा करने लिए अमेरिका से कलकत्ता पहुंचे। इस जहाज में छह हजार राइफलें भारी संख्या में कारतूस और बम थे। वे कलकत्ता से लाहौर पहुंचे इसके बाद लाहौर और कपूरथला पहुंचे यहां विष्णु गणेश पिंगले, सचींद्र सन्याल और सरदार करतार के साथ बैठक कर 21 फरवरी को होने वाली सशस्त्र क्रांति की रूपरेखा बना रहे थे । इसमें यह तय किया गया कि अंग्रेज गर्वनरों को बंधक बनाकर दंडित किया जाएगा। परमानंद अपने मकसद में कामयाब हो पाते इसके पहले ही 17 फरवरी को उनके ही साथी करतार सिंह ने अंग्रेजी हुकूमत से मुखबिरी कर दी और सारे क्रांतिकारी दबोच लिए गए। इनके पास से भारी मात्रा में असलहे भी बरामद किए गए। इनमें से सात को फांसी की सजा सुनाई गई तथा पंडित परमानंद को आजन्म कारावास की सजा सुनाकर कालापानी जेल भेज दिया गया। तीस साल बाद सजा से रिहा होकर 13 अगस्त 1933 को जब पंडित जी वापस लौटे तो उनके साथी उनके स्वागत को पहुंचे तो उन्होंने कहा था कि वह इस सम्मान के काबिल नहीं हैं क्योंकि वह हारे हुए सिपाही हैं। सुभाष चंद्र बोस पं. परमानंद को दादा कहकर संबोधित करते थे। आजादी के बाद भी पं. परमानंद झांसी में ही मुफलिसी की जिंदगी जीते रहे उनका 13 अप्रैल 1982 को निधन हो गया।
अंग्रेज जेलर को पटक पटक पीटा था पं.परमानंद ने
साहित्यकार अजित पुरोहित बताते हैं कि पं. परमानंद अमेरिका से असलहे लाने के साथ ही इंग्लैंड सरकार की सैनिक छावनियों के गोपनीय मानचित्र भी अपने साथ लाए थे। उनका मकसद था कि पहले देश में सशस्त्र क्रांति करेंगे तथा बाद में इंग्लैंड की ब्रिटिश सरकार पर भी हमला बोलेंगे। पर, वे कामयाब नहीं हो सके। कालापानी जेल में अंग्रेज जेलर बहुत सख्त था। कैदी उससे भयभीत रहते थे, एक दिन उसका पाला पं. परमानंद से पड़ गया। उन्होंने कहा कि मैं पं, परमानंद झांसी वाला हूं किसी से डरता नहीं हूं। इसी बात से नाराज जेलर हाथापाई पर उतर आया तथा पं. परमानंद ने जेलर को पटक पटक कर पीट डाला। फिर, क्या था पं. परमानंद को तीस बेतों की सजा से दंडित किया गया।