झांसी। मेरा हाथ अब वापस नहीं आ सकता। मुझे फेंकने वालों को ढूंढ पाना भी आसान नहीं। मैं तो इतना चाहती हूं कि कुछ ऐसा किया जाए जो कोई मेरी तरह अपनी बेटी को कूड़े में न फेंके। किसी बच्ची से उसकी मां का आंचल न छीना जाए। आखिर मैने किसी का क्या बिगाड़ा था। कुत्ते मेरा हाथ खा गए। अब मुझे पूरा जीवन एक हाथ के सहारे की काटना होगा। अगर यह नवजात बोल रही होती तो शायद आज समाज और सिस्टम से यही कहती।
सोलह दिसंबर से मेडिकल कालेज में भर्ती है यह नवजात। अभी यह नहीं कह सकते हैं कि वह पूरी तरह स्वस्थ है। अभी भी आक्सीजन पर ही है। बीच में आक्सीजन हटा दी गई थी लेकिन फिर से लगानी पड़ी। डाक्टरों का कहना है कि कुछ दवाएं जरूर कम कर दी गईं हैं। अमर उजाला ने बच्ची को न्याय दिलाने के लिए मुहिम शुरू की। इसका असर भी हुआ और बाल आयोग की टीम झांसी पहुंची। इस मामले को संज्ञान लिया गया। पुलिस ने भी मुकदमा दर्ज कर लिया। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस बच्ची को न्याय मिल गया। बच्ची को फेंकने वाले आज भी आराम से होंगे। क्योंकि वह जान रहे हैं कि कुछ होने वाला नहीं। आज सबसे बड़ी जरूरत लोगों को जागरूक करने की है। बेटा-बेटी का भेद दूर करने की है।