झांसी। एक दशक पहले तक चुनावों में खादी वस्त्रों की धूम रहती थी, नेताओं के सिर पर गांधी और नेहरू टोपी रहती थी। खादी के कुर्ता-पायजामा पहनना देश भक्ति की पहचान थी, लेकिन वर्तमान में खादी वस्त्रों को लेकर परिदृश्य बिल्कुल अलग है। लगभग सभी राजनीतिक दलों के नेता जींस और ब्रांडेड कुर्ता और जैकेट पहने नजर आते हैं।
देश में स्वतंत्रता आंदोलनों और आजादी के बाद लंबे समय तक खादी को लेकर हमेशा सभी आयु वर्गों में विशेष क्रेज रहा है। लेकिन अब बदलते जमाने के साथ खादी की जगह स्टाइलिश चिकन, कॉटन के कपड़ों, ब्रांडेड कंपनियों की जींस और जैकेट ने ले ली। महानगर के बुजुर्ग बसंत प्रकाश बताते हैं कि सेवादल कैंप लगने और चुनाव के मौसम में खादी का बाजार किसी शादी सीजन से कम नहीं होता था। लोग उत्साह से खादी वस्त्र खासकर गांधी और नेहरू टोपी खरीदते थे। अब वह सब नजर नहीं आता है।
चुनाव के बाद भी खादी की बिक्री को लेकर कोई फर्क नहीं पड़ा है। खरीदारों का इंतजार है। खादी वस्त्रों में वर्तमान में 25 प्रतिशत छूट चल रही है।
प्रीतम सिंह खादी वस्त्र विक्रेता
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पहले चुनाव के दौरान खादी वस्त्रों की व्यापक मांग होती थी। अभी चुनाव के बाद भी बाजार सुस्त है। खादी वस्त्रों के प्रति युवाओं में भी उत्साह नहीं है।
चतुर सिंह यादव खादी वस्त्र विक्रेता
कांग्रेस चलाएगी जागरूकता अभियान
एक वक्त था, जब कांग्रेस नेताओं और पार्टी कार्यकर्ताओं में खादी वस्त्रों को लेकर विशेष क्रेज था। सेवादल के कार्यकर्ता खादी से बनी यूनिफार्म, गांधी अथवा नेहरू टोपी पहने अक्सर नजर आते थे, लेकिन अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं की तरह कांग्रेसी भी नये ट्रेंड के परिधानों को पहनकर पार्टी की बैठकों और कार्यक्रमों में आने लगे। इस बारे में पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने कहा कि खादी हमारे देश की प्रमुख पहचान है। एक वक्त था जब लोग खादी वस्त्रों को तिजोरी में रखते थे। हालांकि अब नई युवा पीढ़ी खादी वस्त्रों में रुचि नहीं ले रही है। ऐसे में जल्द ही पार्टी में खादी को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा। इधर प्रदेश सचिव मनीराम कुशवाहा ने कहा कि खादी हमें देश भक्ति से जोड़ती है।
यह है खादी वस्त्रों के भाव
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कुर्ता - - 500 से 900 रुपये तक
पजामा -- 500 से 800
सदरी -- 700 से 3000
शॉल -- 500 से 2500
गांधी व नेहरू टोपी 60 से 80 रुपये तक