अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। हजार मील की यात्रा भी एक छोटे कदम से शुरू होती है। एक छोटे से कदम से नीलम सारंगी न केवल बुंदेलखंड की लुप्त होती कलाओं को पुनर्जीवित करने में लगी हैं, बल्कि कला को रोजगार से जोड़कर मुकाम हासिल किया है। बेकार को आकार देने में उन्हें महारत हासिल है। जल्द ऐसी ही कलात्मक वस्तुओं का पहला शोरूम झांसी में खोलने जा रही हैं। उनके साथ 25 से 30 लड़कियां भी इस स्वरोजगार का हिस्सा बनी हुई हैं।
आवास विकास कॉलोनी की रहने वाली नीलम सारंगी बताती हैं कि भोपाल से 2016 में झांसी आईं तो अपने घर की छत पर रूफ गार्डन की सज्जा कबाड़ की वस्तुओं से की। लोगों से सराहना मिली तो आइडिया आया, क्यों न इसे रोजगार का साधन बनाया जाए। फिर क्या था शुरुआत हो गई। टायर, लकड़ी का सामान और अन्य कबाड़ को आकार देने की। इसके बाद राइज इन्क्यूबेशन और एमएसएमई से जुड़ीं तो झांसी में 22 से ज्यादा डलावघरों को कबाड़ से आकार देकर सेल्फी प्वाइंट तैयार करवाए। प्रयागराज में लगे महाकुंभ में काम मिला। यहां सेल्फी प्वाइंट बनाए। कई शहरों में अब अपनी कलाकृतियों को लगा रही हैं।
सारंगी बताती हैं कि बुंदेलखंड की लुप्तप्राय कलाओं को सहेजने के लिए वह जूट व बांस की टोकरियां बना रही हैं। कई अन्य कलाओं को लेकर भी उनका काम चल रहा है। नीलम बताती हैं कि ऐसा नहीं है कि संघर्ष के बिना सफलता मिल जाती है। उन्हें भी इस मुकाम को हासिल करने में प्रतिस्पर्धा के साथ ही संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन, अब ऑर्डर मिलते हैं। कई महिलाएं अपने घर के लिए भी काम लेकर जाती हैं। हजारों रुपये की आमदनी करती हैं। छात्राओं को प्रशिक्षण देती हैं। कॉलेजों में वर्कशॉप करती हैं। अब कलाओं को सहेजने के लिए शोरूम में कई कलाओं के नमूनों के साथ ही कबाड़ से बनीं कलाकृतियां भी उपलब्ध होंगी।