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नगर निगम ने बना ली दूरी, गंदगी के बीच जीना मजबूरी

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झांसी। बीस साल पहले नगर निगम सीमा में शामिल हुए इलाकों से नगर निगम ने भी आज तक दूरी बना रखी है। इन इलाकों में निगम की ओर से मुहैया होने वाली सुविधाएं तक नहीं पहुंची। दूर-दराज होने से न इन इलाकों में सफाई की निगरानी होती है न यहां कभी निगम अफसर का दौरा होता है। उपेक्षा के चलते यह इलाके अन्य शहरी इलाकों के मुकाबले विकास की दौड़ में काफी पीछे छूट चुके हैं।
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फरवरी 2002 में बिजौली, हंसारी, गढ़ियागांव, करारी, करगुवां, कोछाभांवर, भगवंतपुरा, पिछोर, सिमरधा, सिमराहा, लहरगिर्द, बूढ़ा, तालपुरा, सिगर्रा, मैरी ग्राम सभा शामिल हुई थी, लेकिन यहां के अधिकांश इलाकों में लोग अभी ग्रामीण परिवेश में ही रह रहे हैं। अधिकांश इलाकों में नियमित सफाई कर्मचारी आज भी नहीं जाते।
जैन धर्मावलंबियों के लिए विशिष्ट स्थान माने जाने वाले करगुवां में नियमित सफाई कर्मचारी नहीं होने से चारों ओर गंदगी फैली रहती है। आसपास बड़ी संख्या में नर्सिंग होम एवं क्लीनिक होने से उनका भी कचरा पड़ा रहता है। मोहल्ले के मुहाने पर ही कूड़ा जमा रहता है। इसी रास्ते से जैन श्रद्घालु मंदिर जाते हैं, लेकिन नगर निगम में इसकी कोई सुनवाई नहीं होती। अन्य दूसरे इलाकों को भी यही हाल है। कोछाभांवर, पिछोर, सिगर्रा, भगवंतपुरा समेत इन सभी इलाकों में घरों से कूड़ा नहीं उठता। प्राइवेट सफाईकर्मियों की मदद से यहां सफाई हो पाती है।
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पीने का पानी न मिलना भी यहां की सबसे बड़ी समस्या है। राजगढ़, बल्लमपुर, बैकुंठपुरी, बजरंग मोहल्ला, हरिनगर, क्रेशर मोहल्ला जैसे दर्जनों इलाकों में पानी के लिए सिर्फ हैंडपंप सहारा है। शहरी सीमा में शामिल होने के बावजूद यहां पाइप लाइन नहीं पहुंची। गर्मियों में जलस्तर नीचे चला जाता है। चार महीने तक हैंडपंप शोपीस बन जाते हैं। टैंकर से किसी तरह पानी पहुंचाया जाता है।
इन इलाकों में भीतरी सड़कों की दशा भी अच्छी नहीं है। अंदर के हिस्सों में रास्ता कच्चा है। एपेक्स भी नहीं बिछाया। स्थानीय लोगों के मुताबिक बारिश के दिनों में काफी परेशानी होती है। बिजली आने-जाने का कोई समय नहीं है। घंटों बिजली नहीं आती। इस वजह से बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पाती। उनका कहना है कि बिल शहरी दरों के मुताबिक लिया जाता है लेकिन, आपूर्ति में सुधार नहीं हुआ। स्थानीय लोगों का कहना है श्रीनगर, बल्लमपुर जैसे इलाकों में खंबे भी नहीं लगे। जुगाड़ के रास्ते मोहल्लों के भीतर बिजली पहुंचाई गई है। नगर निगम के ही ध्यान न देने से बिजली विभाग ने भी इन इलाकों को उपेक्षित कर रखा है।
- शहरी इलाका होने के बावजूद सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। पूरे मोहल्ले में गंदगी रहती है। सफाई कर्मचारी आते ही नहीं।
विजय शुक्ला
- पीने का पानी न मिलने से सबसे ज्यादा परेशानी होती है। स्ट्रीट लाइट भी नहीं है। मोहल्ले के आसपास ही कूड़ा का ढे़र जमा रहता है।
अंजू यादव
- घरों से कूड़ा उठवाने की व्यवस्था शुरू नहीं हुई। यहां सिर्फ प्राइवेट सफाई कर्मचारियों की मदद से ही सफाई हो पाती है।
सृष्टि
- नगर निगम सीमा में शामिल होने के बावजूद यहां निगम की ओर से मिलने वाली सुविधाएं भी आज तक नहीं मिली। कई बार हम लोग शिकायत कर चुके लेकिन, आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई
आकाश
सफाई का कोई इंतजाम नहीं है। इस वजह से यहां हमेशा डेंगू, मलेरिया का रोग फैल जाता है। कूड़ा कई हफ्ते तक पड़ा रहता है। जब कई बार शिकायत की जाती है तब जाकर यह हटता है।
पवन
सड़क और स्ट्रीट लाइट भी खराब होने पर दुरुस्त नहीं कराई गई। थोड़ी दूर में नाला कई महीने से चोक है। उसका गंदा पानी सड़क पर बहता है। इसे भी ठीक नहीं कराया गया
प्रकाश
नगर निगम को ग्राम समाज की जमीन का भी पता नहीं
वर्ष 2002 में नगर निगम सीमा में शामिल होने के बाद इन ग्राम सभाओं की भूमि नगर निगम में मर्ज हो गई लेकिन, निगम अभी तक इस पूरी जमीन को चिन्हित नहीं कर सका है। इसका फायदा आसपास सक्रिय भू-माफिया उठाते हैं। मैरी, बूढ़ा, कोछाभांवर, लहरगिर्द आदि इलाकों में बड़ी संख्या में नगर निगम की जमीन पर स्थानीय लोगों ने कब्जा जमा रखा है। इसको रोकने के लिए नगर निगम सदन ने इनको चिन्हित करते हुए बोर्ड लगाने की बात कही थी लेकिन, यह काम भी आज तक पूरा नहीं हो सका है।
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