झांसी। लॉकडाउन में ओपीडी बंद रहने की वजह से जिले में दवाओं की बिक्री 70 फीसदी तक घट गई है। हालांकि, धूप में लोगों के बाहर नहीं निकलने से भी तमाम रोग कम हुए हैं। धूल, प्रदूषण में कमी आने से सांस के रोगी भी घटे हैं। जो ऑपरेशन और मर्ज का इलाज बहुत जरूरी नहीं है, उनको टाल दिया जा रहा है। वहीं, मजदूरी कर गुजर बसर करने वालों के काम धंधे बंद पड़े हुए हैं। ऐसे में उनके पास दवा खरीदने का पैसा ही नहीं है। इन सब का असर दवाओं की बिक्री पर असर पड़ा है।
जिले में सवा सौ मेडिकल स्टोर पंजीकृत हैं। सभी को मिलाकर प्रतिदिन लगभग 50 लाख रुपये की दवाओं की बिक्री होती है। कोरोना वायरस के कारण चाहें सरकारी हो या निजी अस्पताल सभी की ओपीडी बंद चल रही है। मुहल्लों में खुलने वाले क्लीनिक भी बंद पड़े हैं। ऐसे में लोग अपने मर्ज को दिखाने जा नहीं पा रहे हैं। हालांकि, मेडिकल कॉलेज ने दो-तीन दिन से टेलीमेडिसिन सुविधा शुरू की है। ऐसे में मरीज डॉक्टरों को फोन करके दवाएं पूछ रहे हैं। वहीं, लॉकडाउन में वाहन बहुत कम चलने की वजह से एक्सीडेंट भी कम हो रहे हैं। इसके अलावा धूप में घरों से बाहर नहीं निकलने के कारण भी त्वचा संबंधी रोग, डिहाइड्रेशन, लू लगना, बाहर का दूषित खाने-पीने से उल्टी-दस्त होना आदि रोग भी बहुत कम हो गए हैं। वहीं, धूल, प्रदूषण में कमी आने से सांस रोग भी नहीं हो रहे हैं। इन सबका असर जिले में दवाओं की बिक्री पर पड़ा है। मेडिकल स्टोर संचालक सुभाष वाजपेयी और विवेक सेठ का कहना है कि दवाओं की बिक्री 70 तक घट गई है। मधुमेह, हृदय, टीबी, हड्डी, अस्थमा, सीओपीडी समेत लंबे समय से चले आ रहे रोगों की दवाएं ही बिक रही हैं, वो भी पुरानी लिखी दवाएं ही मरीज खरीदकर ले जा रहा है।
डॉक्टरों ने ये भी कारण बताए
- मरीज घरों से निकल नहीं पा रहे हैं।
- हर मरीज को होम डिलीवरी भी नहीं हो रही है।
- बीपी मरीजों की जांच न होने से नई दवाएं नहीं खिल पा रहे।
मल्टीविटामिन, बॉडी सप्लीमेंट कैप्सूल की बिक्री भी घटी
मेडिकल स्टोरों की आय में पांच प्रतिशत तक की बिक्री च्यवनप्राश, प्रोटीन और बॉडी सप्लीमेेंट, हेल्थ ड्रिंक, मल्टीविटामिन कैप्सूल आदि से होती है। मेडिकल स्टोर संचालकों ने बताया कि इनकी बिक्री भी तेजी से घट गई है। गिने-चुने लोग ही इन्हें खरीद रहे हैं।
डॉक्टर बोले
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लॉकडाउन में धूल, प्रदूषण से होने वाले रोगों में कमी आई है। जिला अस्पताल में 20-30 सीओपीडी के मरीज हर समय भर्ती रहने थे, अब उनकी संख्या घटकर चार-पांच रह गई है। बीड़ी बंद होने से भी सांस के रोग कम हो गए हैं। घर में रहने की वजह से लू लगना, डिहाइड्रेशन, उल्टी, दस्त और बुखार भी कम हो रहा है। - डॉ. डीएस गुप्ता, फिजीशियन।
धूप में न निकलने से 90 फीसदी से अधिक त्वचा रोगी कम हो गए हैं। मजदूर वर्ग के लोगों को लगातार काम करने से पसीने से दाद, खाज, खुजली हो जाती थी, जो अब नहीं हो रहे। धूप में न निकलने से झाइयां और पिंपल्स नहीं हो रहे हैं। पार्लर बंद होने से कॉस्मेटिक क्रीम आदि न लगाने से महिलाओं को साइड इफेक्ट नहीं हो रहे। - डॉ. प्रतीक शिवहरे, त्वचा रोग विशेषज्ञ।
80 फीसदी दंत रोग इमरजेंसी की श्रेणी में नहीं आते हैं, जैसे पायरिया, मसूड़े से खून आना, मुंह में छाला, दांत लगवाना आदि। इन मरीजों को क्लीनिक में सामान्य ओपीडी बंद होने से नहीं देखा जा रहा है। आकस्मिक मामलों में ज्यादातर दुर्घटना से जबड़े टूटने के मामले आते हैं, लॉकडाउन में कम वाहन चलने से ऐसे मरीज भी कम आ रहे हैं। - डॉ. रजत मिसुरिया, दंत रोग विशेषज्ञ।