मकर संक्रांति पर ओरछा में बेतवा किनारे बरसे थे सोने के फूल
ओमप्रकाश दुबे
ओरछा। उत्तरायण होते सूर्य व ऋतुओं के संधिकाल की पावन बेला पर लोग पवित्र नदियों में स्नान कर तीर्थ क्षेत्रों में जाकर मंदिरों में पूजा अर्चना करते हैं। पर, इसके इतर ओरछा की इस पर्व को लेकर एक अलग कहानी है। ऐसी क्षेपककथा है कि महाराज मधुकर शाह की भक्ति की लाज रखने के लिए भगवान श्रीकृष्ण व राधारानी को प्रकट होना पड़ा था। उन्होंने बेतवा के किनारे राजा-रानी के साथ नृत्य भी किया था। उसी समय आसमान से सोने के फूलों की बारिश हुई थी। इसी आधार पर बेतवा के एक घाट का नाम कंचना घाट पड़ा।
कथा के अनुसार सोलहवीं सदी में ओरछा रियासत की गद्दी पर महाराज मधुकर शाह हुआ करते थे। वह श्रीकृष्ण के उपासक थे। जबकि, उनकी महारानी कुंअर गणेश रामजी की उपासक थीं। दोनों के बीच आए दिन अपने आराध्य की महिमा को लेकर भक्तिपूर्ण वाद-विवाद होता रहता था। बात उस समय की है जब कुंअर गणेश रामराजा को ओरछा नहीं लाईं थीं। बेतवा किनारे जुगल किशोर जू का विशाल मंदिर था। मकर संक्रांति के एक दिन पहले दरबार के किसी कार्य से राजा अधिक व्यस्त हो गए तथा जुगल किशोर जू के रात्रिकालीन दर्शन करने नहीं जा सके। महल में आते ही रानी ने कहा कि प्रभु साधना में नियम का तोड़ना वर्जित माना जाता है, इसलिए आपको मंदिर जरूर जाना चाहिए। राजा मधुकरशाह ने कहा कि अब तो मंदिर बंद करके पुजारी भी घर जा चुके होगे, पर रानी के तंज ने राजा को मंदिर जाने पर मजबूर कर दिया।
महाराजा जुगल किशोर मंदिर पहुंचे तो उन्हें दरवाजा बंद मिला। इस पर महारानी ने व्यंग्य करते हुए कहा जिन श्रीकृष्ण के आप दिन रात गुण गाते हैं वे आपकी एक पुकार पर मंदिर से बाहर चले आएंगे! अपनी भक्ति को लेकर इस तरह के व्यंग्य भरे वचन सुनकर मधुकरशाह मंदिर के दरवाजे पर ही बैठकर कीर्तन करने लगे। रात के तीन पहर गुजर गए। मकर संक्रांति के दिन ब्रह्म मुहूर्त में अपने भक्त की लाज रखने के लिए मंदिर का दरवाजा खुला और जुगल किशोर जी राधारानी के साथ प्रकट हुए। रानी और राजा कीर्तन कर रहे थे। श्रीकृष्ण व राधारानी ने मंदिर के सामने ही बह रही बेतवा नदी के किनारे स्थित घाट पर पहुंचकर कीर्तन के बीच राजा और रानी के साथ नृत्य किया। कहा जाता है उस समय आसमान से सोने के फूल बरसने लगे थे। इसके बाद से ही इस घाट का नाम कंचना घाट हो गया। कहा जाता है कि यह सोने के फूल अब भी ओरछा राजघराने में सुरक्षित हैं। बेतवा के कंचना घाट पर मकर संक्रांति स्नान करने का विशेष फल माना जाता है। नदी किनारे जुगल किशोर मंदिर अब भी खंडहर के रूप में मौजूद है, क्योंकि संवत 1631 में रामराजा सरकार के ओरछा आने के बाद, जुगल किशोर जू को ओरछा रियासत की शाखा पन्ना में विराजमान करवा दिया गया था।
महाराजा मधुकरशाह को भगवान कृष्ण द्वारा दर्शन देकर नृत्य करने और कंचना घाट पर कंचन के फूल बरसने की कहानी ओरछा की क्षेपक कथाओं में शामिल है। इसका भक्तमाल में भी उल्लेख है।
रमाकांत शरण महाराज
प्रधान पुजारी रामराजा मंदिर ओरछा
श्रीकृष्ण जी के बेतवा नदी किनारे नृत्य करने व सोने के फूल बरसने की जुगल किशोर की कहानी यहां लोक प्रचलित है। पुरानी पुस्तकों में इसका उल्लेख भी किया गया है।
रविशंकर तिवारी
पुजारी चतुर्भुज मंदिर ओरछा