झांसी। बुंदेलखंड की धरती से डा. वृंदावन लाल वर्मा के बाद अगर हिंदी उपन्यास और कहानी के क्षितिज पर किसी ने राष्ट्रीय पहचान बनाई है तो वह नाम है बुंदेलखंड की बेटी मैत्रेयी पुष्पा का। डा. वृंदावन लाल ने खड़ी बोली में लिखे उपन्यासों में बुंदेलखंड के पात्र और विषयवस्तु का खूब प्रयोग किया पर बुंदेली बोली का प्रयोग नहीं किया। मैत्रेयी पुष्पा ने खड़ी बोली के साथ बुंदेली का अभिनव प्रयोग कर अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने बुंदेली बोली की सौभाग्य की बिंदी हिंदी के माथे पर रखकर जहां राष्ट्रभाषा को एक नई ऊंचाई दी है, वहीं अपने घर और गांव की मिट्टी की सौंधी खुशबू को देश और दुनिया तक पहुंचाया। इसीलिए तो बुंदेलखंड के लोग उनके साहित्य के बारे में कहते हैं, हिंदी के माथे पर बिंदी बुंदेली की धरदई। हिंदी के उत्थान और बुंदेली बोली को व्यापक बनाने के लिए क्या सोचती हैं मैत्रेयी पुष्पा इसी मुद्दे पर उनसे टेलीफोन पर बातचीत की गई।
अंग्रेजी की गुलामी से उबरे बिना हिंदी को जनभाषा बनाना संभव नहीं
हिंदी को जनभाषा बनाने के सवाल पर मैत्रेयी कहती हैं कि जब तक माता- पिता बच्चों को बिल्ली से कैटी और कुत्ते से डॉगी कहलवाना बंद नहीं करेंगे तब तक हिंदी को जन- जन की भाषा बनाना संभव नहीं है। देश आजाद हो गया पर हम अंग्रेजियत की भाषायी गुलामी से अब तक आजाद नहीं हो सके हैं। इसके लिए हिम्मत चाहिए। ऐसी प्रबल इच्छा शक्ति जिसके बूते हम दूसरों की भाषा और संस्कृति को न अपनाएं बल्कि दूसरे लोग हमारी भाषा और संस्कृति को स्वीकार करने को मजबूर हो जाएं। मुझे अंग्रेजी नहीं आती है और मैंने कभी सीखने का प्रयास भी नहीं किया। मंचों पर अंग्रजी में व्याख्यान देने वालों को मैं टोक देती हूं कि मुझे अंग्रेजी समझ नहीं आती कृपया आप हिंदी में बोलें। जब हम इस स्तर पर अपनी इच्छा शक्ति को विकसित करेंगे तब हिंदी का उत्थान कोई रोक नहीं सकता।
इदन्नमम उपन्यास में पाठकों ने हिंदी के साथ बुंदेली को लिया हाथोंहाथ
मैत्रेयी जी ने बताया कि देश के कई बड़े पुरस्कार पाने वाले उनके उपन्यास इदन्नमम में साहित्य की भाषा कही जाने वाली खड़ी बोली से अधिक प्रयोग की गई बुंदेली खूब चर्चा में रही। वृंदावन लाल वर्मा व मैथिलीशरण गुप्त ने खड़ी बोली में तो खूब लिखा पर बुंदेली से परहेज करते रहे। मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि उन्होंने अपने उपन्यास और कहानियों में बुंदेली पात्र लिए हैं, उन पात्रों के मुंह से खड़ी बोली के संवाद की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती है। हां मैने इतना जरूर किया है कि पूरा संवाद बुंदेली में होने के बाद भी उसकी क्त्रिस्या को सरल हिंदी में कर दिया है, जिससे देश के दूसरे हिस्सों के लोग इसे आसानी से समझ सकें। इसी का परिणाम रहा कि कर्नाटक जैसे गैरहिंदी भाषी प्रदेश में भी इदन्नमम की हिंदी और बुंदेली की जुगलबंदी को खूब चर्चा मिली। बुंदेली एक रौबदार बोली है, दादी को बुंदेलखंड में लोग बऊ कहते हैं। जब लोग पूछते हैं बऊ का कर रईं तो वह रौबदार जवाब देती हैं, न कछू । बुंदेलखंड के किसान और महिलाओं के संवादों को मैंने हिंदी के उपन्यासों में भी बुंदेली में ही प्रयोग किया है। गांव के पथनवारे, पनघट महिलाओं के सुखदुख की व्यथा साझा करने के माध्यम रहे हैं, इनकी तस्वीर भी मैने अपने लेखन में खींची है।
रेणुजी ने भी हिंदी के साथ आंचलिक बोली का किया सफ ल प्रयोग
मैत्रेयी पुष्पा कहती हैं कि उनके द्वारा हिंदी के साथ बुंदेली का प्रयोग साहित्य के क्षेत्र में कोई नई बात नहीं है, इसके पहले फ णीश्वरनाथ रेणु भी खड़ी बोली के साथ आंचलिक भाषा का प्रयोग कर चुके हैं । इसके लिए जरूरत होती है प्रबल इच्छाशक्ति की, क्योंकि अंचल के साहित्यकार जब दिल्ली की गोष्ठयों में पहुंचते हैं तो वे उसी साहित्यिक भाषा में बह जाते हैं और भूल जाते हैं अपनी मिट्टी की भाषा और संस्कृति को।
मैत्रेयी पु्ष्पा का कहना है अपनी भाषा और अपनी मिट्टी की महक को कायम रखने के लिए साहित्यकार, कवि और पत्रकारों को आगे आना होगा। भाषा से ही व्यक्ति का सांस्कृतिक अस्तित्व है। अगर हिंदी के साथ बुंदेली का प्रयोग न करती तो शायद आज मैत्रेयी पुष्पा इस मुकाम पर न होती।