झांसी। कोछाभांवर के मटके, कभी न निकले चटके, ले जाओ निखटके, पानी पिओ डटके। इस कहावत के साथ कोछा भांवर के मटके देश के दूर-दराज के इलाकों तक झांसी का नाम लेकर बिकने जाते थे। इस बार के कोरोना ने मटकों के कु म्हारों की आर्थिक सेहत चटका दी। मटकों के पीक सीजन में ही हुए लॉकडॉउन से पूरा कारोबार ही चौपट हो गया। इन मटकों से साल भर की कमाई करने वाले परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया है।
कोछाभांवर के मटकों की देश के भीतर अलग पहचान है। इन मटकों की खूबी है कि यह चाक पर नहीं बनते बल्कि एक-एक मटके को कारीगर हाथ से बनाते हैं। एक मटका बनाने में मेहनत के साथ ही काफी समय भी लगता है लेकिन, इसके बाद जो मटका तैयार होता है वह न सिर्फ देखने में खूबसूरत होता है बल्कि इनकी तासीर भी अलग हो जाती है। दूसरे मटकों के मुकाबले यह काफी टिकाऊ भी माने जाते हैं। कोछा भांवर में बसे प्रजापति समाज के करीब डेढ़ सौ परिवार के लिए यह आज भी पुश्तैनी धंधा है। फरवरी-मार्च से मटके बनाने का काम शुरू हो जाता है। परिवार के पुरुष सदस्य मिट्टी लाने के साथ ही उसे तैयार करने का काम करते हैं। उसके बाद आंवा बनाने का काम महिला एवं पुरुष दोनों मिलकर करते हैं। पकने के बाद आंवा से निकालकर उनको सजाने का काम घर की बहू- बेटियां करती हैं। इसे बनाने का काम करने वाले हरिमोहन प्रजापति बताते हैं हर साल यह मटके बड़े-बड़े कारोबारी मुंबई, पुणे, नासिक, भोपाल, इंदौर, सतना, दिल्ली, आगरा आदि इलाकों तक लेकर जाते हैं। हर साल हजारों मटके तैयार होते हैं। अपनी ठंडी तासीर की वजह से बुंदेलखंड का देशी फ्रिज कहे जाने वाले यह मटके इन सैकडा़ें परिवार के लिए जीवकोपार्जन का एक मजबूत जरिया रहा है लेकिन, इस बार लॉकडॉउन ने इनकी कमर तोड़कर रख दी। अप्रैल महीने में कोरोना की रफ्तार तेज होने के बाद देश के अलग-अलग इलाकों में लॉकडॉउन लगने लगा जबकि यही इनकी सप्लाई का समय होता है। उसके बाद पूरे मई तक यूपी में भी कारोबार बंद रहा। जून में लॉकडॉउन खुलने के बाद बारिश का मौसम आ गया। प्रजापति समाज के अध्यक्ष सुरेश प्रजापति कहते हैं कि इन मटकों के जरिए तमाम परिवार अपना जीविकोपार्जन करते थे लेकिन, अबकी सिर्फ दस फीसदी ही बिक्री हुई। प्रशासन भी कोई ध्यान नहीं दे रहा है।
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मिट्टी की कमी से भी जूझ रहे कुम्हार
इन कुम्हारों का कहना है कि उनको मिट्टी तक नहीं मिल रही है। प्रशासन की ओर से करीब दो दशक पहले पास के दो स्थान मिट्टी के लिए आवंटित किए गए थे लेकिन, चार साल पहले वहां मिट्टी खत्म हो गई। उसके बाद कई बार मांग की गई लेकिन, नए स्थान नहीं दिए गए। सरकार ने इलेक्ट्रिक चाक भी कुछ लोगों को दिए लेकिन, उनसे करंट लगने की वजह से वह उपयोगी नहीं हैं। इसकी सब्सिडी का भी उनको फायदा नहीं मिल रहा है।