झांसी। नए केंद्रीय बजट के दौरान वित्तमंत्री ने एक बार फिर 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का भरोसा दिलाया लेकिन, आय दोगुना करने का रोडमैप समझ पाना विशेषज्ञों के लिए पहेली से कम नहीं। उपज की लागत कम होने के बजाय लगातार बढ़ती जा रही है। उपज का सही मूल्य भी नहीं मिल रहा, ऐसे में किसानों की आय अगले वर्ष तक दोगुनी कैसे होगी, यही सबसे बड़ा सवाल है।
बुंदेलखंड में गेहूं, मटर, चना, मूंगफली, उड़द एवं मूंग की बुवाई अधिक होती है। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक बुंदेलखंड इलाके में गेंहू की बुवाई पर करीब 33,205 रुपये प्रति हेक्टेयर खर्च आता है। इनमें जुताई, बुवाई, खाद, बीज, सिंचाई, मजदूरी शामिल है। इसी तरह धान की फसल में 30,995 रुपये, चना 28,155 रुपये, मूंगफली 30,068 रुपये, मटर 30,512 रुपये, उड़द व मूंग 18072 रुपये की लागत आती है। इसमें जमीन का किराया एवं किसानों का श्रम का शमिल नहीं है। वहीं, डीजल का दाम लगातार बढ़ने से जुताई एवं सिंचाई की लागत लगातार बढ़ रही है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जनपद में गेहूं की औसत उत्पादकता 18.86 क्ंिवटल प्रति हेक्टेयर है।
पिछली बार करीब गेहूं का1900 रुपये प्रति क्विंटल न्यूनतम समर्थन मूल्य तय था। इस हिसाब से प्रति हेक्टयर 35834 रुपये ही किसान को मिलते हैं जबकि सरकार लागत मूल्य का डेढ़ गुना एमएसपी देने का दावा कर रही। ऐसे में साफ है कि अगर किसान जमीन का किराया एवं अपने परिवार के श्रम की कीमत भी जोड़ लें तब उपज की लागत भी उनके हिस्से नहीं आ रही। इसी तरह खरीफ फसल भी किसान के लिए फायदेमंद नहीं हो पाती। प्राकृतिक वजहों से अगर फसल बच गई तब किसानों को स्थानीय व्यापारियों को उपज बेचने को मजबूर होना पड़ता है।
समय पर सरकारी खरीद केंद्र नहीं खुलते। इन सबके चलते किसी तरह ही किसान को सालभर जिंदगी गुजारने का पैसा मिल पाता है हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि लागत घटाए बिना खेती में फायदा संभव नहीं। नई तकनीक का इस्तेमाल करके इसे घटाया जा सकता है लेकिन, डबल इनकम स्कीम के बावजूद जमीनी हकीकत में लागत घटाने के उपाय नहीं हो रहे। प्रगतिशील किसान राकेश बिहारी का कहना है अभी भी तमाम किसान पंरपरागत तरीके से खेती करते हैं जब तक लागत कम नहीं होगी, खेती से लाभ नहीं होगा। उनका कहना है सरकार ने भी बजट में लागत कम करने को प्रोत्साहित करने का काम नहीं किया।