Kushuma and kundan love story in jhansi
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झांसी। ओरछा में बेतवा नदी के पुल पर खड़े होने पर बहाव वाली दिशा की ओर नदी के बीचोंबीच एक प्राचीन स्मारक दिखाई देता है। इस स्मारक तक बेतवा एक धारा में जाती है तथा स्मारक पर पहुंचकर इसे घेरकर दो अलग धाराओं में विभक्त हो जाती है। यह स्मारक एक विफल प्रेम गाथा का गवाह है, जहां प्रेमी और प्रेमिका ने अपने सात्विक प्रेम के लिए जल समाधि ले ली थी।
ओरछा निवासी कृष्णकांत तिवारी ने बताया कि गोविंद सिंह बुंदेला की पुस्तक अलौकिक ओरछा में यह कहानी पढ़ी थी, इसके अलावा गांव के बुजुर्गों के मुंह से भी सुनीं है। बात है उन दिनों की जब ओरछा की गद्दी पर इंद्रजीत सिंह थे, उनके प्रेमिका रायप्रवीण के साथ प्यार के चर्चों के बाद ओरछा में प्रेम करना अपराध की श्रेणी में नहीं रह गया था। महानगर के रंगरेज चुन्नी लाल की बेटी कुसुमा किसी राजकुमारी से कम नहीं थी, पर जितनी सुंदर उसकी काया थी, उतनी सुंदर किस्मत नहीं। भरी दुनिया में कुसमा एकदम अकेली थी। बचपन में मां का साया उठ गया और शराबी पिता ने दूसरी शादी कर ली थी। सौतेले मां किसी राक्षसी से कम नहीं थी। दिन भर बेतवा के घाट पर नगर के धनाढ्य वर्ग के कपड़े धोकर लाना और शाम को सौतेली मां की जलीकटी सुनने के बाद पेट भर रोटी भी नहीं मिलती थी, कभी-कभी तो सौतेली मां डंडों से मारपीट तक कर डालती थी। कुसमा जवान हो गई। पर, उसके ब्याह की चिंता न तो सौतेली मां रती को थी और न शराबी बाप चुन्नीलाल को। उधर, बेतवा के उस पार सिंहपुरा गांव से कुंदन नाम का युवक रोज नाव से इस पार आकर किले के अंदर बागवानी का काम करता था। उन दिनों बेतवा पर पुल नहीं था लोग नाव से ही नदी पार करते थे। नाव घाट पर उतरने के बाद कुछ देर कुंदन पानी पीकर नदी पर ही रुकता था और इसी क्रम के बीच उसकी कुसुमा से मुलाकात हो गई।
दोनों बातों ही बातों में एक दूसरे का सुख दुख बांटने लगे। कुंदन घर से भोजन लाता था, घाट पर कपड़े धो रही कुसुमा को वह साथ ही बैठकर भोजन भी कराने लगा था अब भूखे पेट रहने वाली कुसमा को भोजन के साथ कुंदन की सहानुभूति ऐसी लगने लगी थी जैसे जेठ की तपती धूप में पेड़ की शीतल छांव मिल गई हो, पर यह सुख ज्यादा दिन का नहीं था। कुंदन और कुसमा के प्रेम के चर्चे उसकी सौतेली मां रती तक पहुंचने में देर नहीं लगी। रती पहले ही बल्देवगढ़ में अपने किसी दूर के रिश्तेदार से कुसमा के ब्याह का वादा कर चुकी थी। जिसके साथ शादी करना चाहती थी वह दो बच्चों का पिता था तथा उसकी पहली पत्नी मर चुकी थी। इसके एवज में वह रती को पचास चांदी के सिक्के भी दे चुका था। बात दरबार तक न पहुंच जाए, इसलिए रती ने कुसुमा को रातोंरात विदा करने का इंतजाम किया। दिन में कुंदन मिला तो कुसमा ने उसे सारे घटना क्रम से अवगत करवा दिया। आज चंदन नाव से उस पार नहीं गया, बल्कि इसी पार नावघाट की छतरियों में बैठ गया। भादों की काली रात में उफनती बेतवा के बीच पिता की उम्र के पन्ना लाल की दुल्हन बनाकर कुसुमा को नाव में बिठा दिया गया। चार लठैत भी कुसमा को घेरकर बैठे थे। नाव घाट से किश्ती चली और कुंदन ने भी नदी में छलांग लगा दी ,उसने भदभदा घाट के टापू पर खड़े होकर जैसे ही नाव को रोकने का प्रयास किया तो लठैत उस पर टूट पड़े , कुंदन को लहूलुहान देख कुसमा ने भी पानी में छलांग लगाई तो वह भदभदा की ऊंचाई वाले तेज जल प्रवाह से नीचे जा गिरी और जल में समा गई, उधर कुंदन ने भी बेतवा में छलांग लगा दी। दोनों को खूब खोजा गया पर वे बेतवा के जल में विलीन हो चुके थे। ओरछा निवासी नारायण सिंह बताते हैं कि जब मामला राजदरबार में पहुंचा तो इंद्रजीत सिंह ने इन दोनों सच्चे प्रेमियों की याद में नदी के बीच भदभदा घाट के पास इनका स्मारक बनवा दिया जो आज भी इस दुखांत प्रेमगाथा का गवाह है।