शहर में रहकर पली-बढ़ी बबीना के एक छोटे से गांव में व्याहकर आईं तो उन्होंने ग्रामीण महिलाओं को जरूरतों को पूरा करने के लिए जूझते देखा। उन्होंने कम पढ़ी लिखी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वयं सहायता समूह से जुड़कर काम शुरू किया। शुरुआत में घरवालों का विरोध झेलना पड़ा लेकिन अब उनकी मुहिम को पहचान मिल चुकी है। वह करीब तीन हजार महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ चुकी हैं।
2012 में स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं
बबीना के गांव रुंधा बलौरा की नीलम बताती हैं कि बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी करते ही शादी हो गई। 2012 में वह स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। उन्होंने जल संकट को देखते हुए लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरुकता पैदा करने में जुट गई। इसी दौरान वह देहाती परिवेश की महिलाओं को दुश्वारियों से रूबरू हुई।
छोटे ऋण से महिलाएं बन रही आत्मनिर्भर
कई बार अपनी दैनिक जरूरतों को भी पूरा न कर पाने की कसक देखी तो उन्होंने बबीना ब्लॉक से हो आत्मनिर्भरता अभियान की शुरुआत कर दी। जैविक खेती, पशुपालन, चाट पकौड़ी के ठेले लगाने सहित कई तरह के रोजगार से महिलाओं को जोड़ना शुरू किया। छोटे ऋण दिलवाए। नीलम बताती हैं कि अब बड़ी संख्या में महिलाएं स्वरोजगार कर रही हैं। वह बताती हैं कि अभी तक समूह के माध्यम से वह करीब तीन हजार महिलाओं को आत्मनिर्भर बना चुकी हैं। उनका लक्ष्य अभी पूरा नहीं हुआ है।
जल संरक्षण की चला रही मुहिम
वह परमार्थ समाजसेवी संस्था के साथ जुड़कर जल संरक्षण की मुहिम को धार देने में लगी हैं। उनका कहना है कि वह परदा प्रथा सहित अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ भी अभियान चला रही हैं। मकसद सिर्फ इतना है कि महिलाओं को चौके-चूल्हे से बाहर निकलकर अपनी जिंदगी खुद बनानी होगी, तभी गांवों की तस्वीर बदलेगी।