मऊरानीपुर के बुखारा में रेशम उत्पादन के लिए 27 एकड़ जमीन चिह्नित कर ली गई है। 2.85 लाख रुपये से इसे तैयार किया जाएगा। जमीन पर करीब 40 हजार अर्जुन के पौधे रोपने का लक्ष्य है।
रेशम उत्पादन अभी मऊरानीपुर के घसौली, कटेरा देहात और बंगरा के बदनपुर में होता है। मऊरानीपुर रेशम उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र होगा। रेशम विभाग के अधिकारी जीपी अनुरागी ने बताया कि जमीन को चिह्नित करने के बाद फेंसिंग करा दी गई है। पहाड़ के नीचे जमीन होने के कारण यह ऊबड़-खाबड़ है, इसलिए मनरेगा के तहत जमीन का समतलीकरण कराया जाएगा। इसके बाद उसमें प्लॉटिंग, रोड निर्माण, पहाड़ी से बरसात में आने वाले पानी को बांध में पहुंचाने के लिए नाला और पुलिया का निर्माण कराया जाएगा।
उन्होंने बताया कि ये काम पूरा होने के बाद इसमें अर्जुन के 40 हजार पौधे रोपे जाएंगे। तीन साल तक पेड़ों के बढ़ने के बाद इसमें रेशम के कीट छोड़े जाएंगे। इसके लिए किसानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन 40 हजार पेड़ से करीब 12 लाख कुकून मिलेगा। इसके बाद जनपद में कुकून की पैदावार 20-22 लाख हो जाएगी। एक कुकून की कीमत दो रुपये होती है।
ऐसे होता है रेशम का उत्पादन
कुकून रेशम उत्पादन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें रेशम के कीड़े (लार्वा) अपने चारों ओर एक सुरक्षात्मक आवरण बनाते हैं। इस प्रक्रिया में रेशम का लार्वा अपनी लार ग्रंथियों से रेशम के धागे निकालकर खुद को लपेट लेता है, जिससे कुकून बनता है। कुकून का उत्पादन मुख्य रूप से कृषि आधारित काम है, जो किसानों के लिए आय का स्रोत है।
ये है प्रक्रिया
कुकून बनने के बाद रेशम के धागों को निकालने के लिए कुकून को तुरंत काटा जाता है। कुकून को धूप में सुखाया जाता है या उबलते पानी में रखा जाता है, जिससे अंदर का लार्वा मर जाता है। इससे रेशम के धागों को कुकून से निकालना आसान हो जाता है। फिर कुकून से रेशम के धागों को सावधानीपूर्वक निकाला जाता है और फिर धागों से कपड़े बुने जाते हैं।
महिला किसानों को जोड़ने का किया जाएगा प्रयास
रेशम उत्पादन में महिलाओं को जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए कार्यशाला आयोजित होगी। महिलाओं के लिए यह स्वरोजगार की ओर कदम साबित होगा।