झांसी। जिले में सस्ती दवाओं की दुकानों पर लगातार ताले लगते जा रहे हैं। खर्च नहीं निकलने से एक तिहाई जन औषधि केंद्र संचालकों ने अपना लाइसेंस औषधि प्रशासन विभाग को सरेंडर कर दिया है। केंद्र संचालकों का कहना है कि डॉक्टर जेनरिक दवाएं नहीं लिखते हैं। इस कारण उनकी बिक्री ही नहीं होती है।
आम आदमी को सस्ता इलाज उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार ने भारतीय जन औषधि परियोजना शुरू की थी। इसके तहत जन औषधि केंद्र खोलने के लिए लाइसेंस दिए गए। यहां पर जेनरिक दवाएं बेहद सस्ते दामों पर मिलनी शुरू हो गईं। जिले में 13 लोगों ने लाइसेंस लेने के बाद जेनरिक दुकानें भी खोल लीं। लेकिन, डॉक्टरों ने जेनरिक के बजाए ब्रांडेड दवाएं लिखना जारी रखा। इससे जन औषधि केंद्रों का खर्चा तक नहीं निकल सका। धीरे-धीरे करके वीरांगना नगर, मेडिकल कॉलेज के पास, सीपरी बाजार समेत चार जन औषधि केंद्र बंद हो गए हैं। अब जो केंद्र खुले भी हैं, उनमें से कुछ और बंद होने की कगार पर पहुंच चुके हैं।
मुहर लगते ही कई गुना बढ़ जाती कीमत
मर्ज के हिसाब से दवाइयों का साल्ट तैयार किया जाता है। जेनरिक दवाइयों में इस्तेमाल में लाया जाने वाला सॉल्ट लगभग एक जैसा होता है। इसके बाद कंपनियों द्वारा उस सॉल्ट को खरीदकर थोड़ी तब्दीली के बाद अपनी मुहर लगा दी जाती है। फिर सॉल्ट की कीमत में काफी बढ़ोतरी हो जाती है। इसके बाद एक्साइज ड्यूटी आदि लगने के बाद वह दवा कई गुना महंगी बिकती है।
ब्रांडेड 15 करोड़, जेनरिक की 50 लाख की बिक्री
झांसी में करीब 70-80 दवा कंपनियों के स्टॉपेज हैं। यह सभी बड़ी कंपनियां हैं, जो बड़ी मात्रा में विभिन्न मर्जों की दवाएं बेच रही हैं। ये कंपनियां कर्मचारियों द्वारा डॉक्टरों, मेडिकल स्टोरों से सेटिंग कर महंगी दवाएं बिकवा रही हैं। इस वजह से जिले के बाशिंदे एक महीने में 15.5 करोड़ से अधिक की दवा खा रहे हैं। इसमें जेनरिक दवाओं का हिस्सा मात्र 50 लाख है। सस्ती होने के बावजूद भी मरीज इनका लाभ नहीं उठा पा रहे।
झांसी में जन औषधि केंद्र का 13 लोगों ने लाइसेंस लेकर दुकानें खोली थीं। अभी सीपरी बाजार में दो, जिला अस्पताल, इलाइट चौराहा, मेडिकल कॉलेज, पुलिया नंबर नौ, मऊरानीपुर, गुरसराय, शहर क्षेत्र को मिलाकर नौ केंद्र चल रहे हैं। जबकि, चार बंद हो चुके हैं। - उमेश भारती, औषधि निरीक्षक।