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बुंदेलखंड में एक हजार बोन डेथ का शिकार, 50 की हड्डियां गलने लगीं

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झांसी। ब्लैक फंगस के बाद पोस्ट कोविड मरीजों के लिए सबसे गंभीर बीमारी बोन डेथ सामने आ रही है। इसमें जोड़ों में तेज दर्द बना रहता है। हड्डियों में खून की चाल खत्म होने लगती है। बुंदेलखंड में इस बीमारी के लगभग एक हजार मरीज मिल चुके हैं, जिनमें 50 की हड्डियां गलनी शुरू हो गई हैं। मेडिकल कालेज में उपचार करा रहे इन सभी को डाक्टरों ने जोड़ प्रत्यारोपण कराने की सलाह दी है।
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कोरोना के मामले भले ही कम हो गए हों लेकिन संक्रमण से ठीक होने वाले मरीजों में हड्डियों से जुड़ी नई बीमारी का पता चला है। यह है एवैस्कुलर नेक्रोसिस, जिसे बोन डेथ के नाम से जाना जाता है। ब्लैक फंगस के बाद यह नई बीमारी तेजी से पैर पसार रही है। इसके पीछे का कारण कोविड के इलाज के दौरान स्टेरॉयड का ज्यादा इस्तेमाल होना है, क्योंकि स्टेरॉयड हड्डियों को नरम बनाते हैं। फिर कार्डिलेज से खून की सप्लाई कम जो जाती है। अस्थि रोग विशेषज्ञों के पास बोन डेथ के अब तक जितने मामले मिले हैं, उनके पीछे स्टेरॉयड ही बड़ा कारण बताया जा रहा है। यह बीमारी कोरोना से तुरंत ठीक होने के बाद नहीं होती है। इसमें तीन महीने से लेकर एक साल तक का समय लग सकता है।
क्या है बोन डेथ
जब हड्डी में खून की सप्लाई खत्म हो जाती है तो ऑक्सीजन की कमी की वजह से हड्डी की कोशिकाएं मरने लगती हैं। इसी कारण उस हड्डी में दर्द महसूस होने लगता है और ज्वाइंट्स खराब हो जाते हैं।
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शुरू में इलाज तो होता फायदा वरना सर्जरी
कोरोना में स्टेरॉयड्स का सेवन करने वाले मरीजों को अपने जोड़ों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अगर मरीज को हाथ, पैर, घुटनों या कमर में अधिक दर्द बना रहता है तो ऐसे मरीजों को एमआरआई की सलाह दी जाती है, इससे ही बोन डेथ की पुष्टि हो पाती है। इस बीमारी का शुरू में ही इलाज शुरू हो जाए तो लाभ मिलता है। बहुत गंभीर स्थिति पर सर्जरी की जरूरत पड़ती है।
ये हैं लक्षण
- जोड़ों में दर्द
- वजन उठाते समय जोड़ दर्द करना
- लेटते, बिस्तर से उठते समय दर्द
- जांघों में दर्द
- कंधों, घुटनों में भारीपन
केस-1
मऊरानीपुर के 35 वर्षीय युवक को कोरोना से ठीक होने के बाद कूल्हे के दोनों जोड़ों में दर्द शुरू हुआ। एमआरआई जांच कराने पर पता चला कि वह बोन डेथ का शिकार है। हड्डियों में खून की चाल कम हो गई है। हड्डियां गलने लगी हैं। वह न तो उकडुं होकर बैठ पा रहा था और न ही पालथी मारकर। सीढ़ी तक चढ़ने का मोहताज हो गया। अब इलाज शुरू हो गया है। भविष्य में जोड़ प्रत्यारोपण भी हो सकता है।
केस-2
शिवपुरी के 55 वर्षीय व्यक्ति भी मेडिकल कॉलेज में बोन डेथ की समस्या से पीड़ित हो गया है। उसके एक कूल्हे के जोड़ में दर्द बना हुआ था तो वह डॉक्टर को दिखाने पहुंचा। बताया कि भारी वजन नहीं उठा पा रहा है। पेशे से श्रमिक होने से वह कामकाज को मोहताज हो गया। जांच में पता चला कि कोविड के इलाज में काफी स्टेरॉयड चलने से उसे ये बीमारी हुई है। अभी दवाएं देकर इलाज शुरू कर दिया गया है।
केस-3
बांदा का 45 वर्षीय व्यक्ति मई में कोरोना की चपेट में आ गया था। 15 दिनों तक अस्पताल में उसका इलाज चला। इस दौरान अधिक मात्रा में स्टेरॉयड भी दी गईं। अब वह बोन डेथ का शिकार हो गया है। शुरूआत में आसपास के डॉक्टर से दवा लेता रहा तो स्थिति और बिगड़ गई। बाद में झांसी में दिखाया। यहां डॉक्टर ने उसे दवाएं तो दे दी हैं लेकिन आगे चलकर जोड़ प्रत्यारोपण कराने की बात कही है।
केस-4
सीपरी बाजार के 40 वर्षीय युवक को कुछ दिनों पहले जोड़ों में तेज दर्द हुआ। बाद में मेडिकल कॉलेज में दिखाने आया तो डॉक्टर ने एमआरआई जांच की सलाह दी। जांच में पता चला हड्डियों में खून की सप्लाई कम होने से वह लगने लगी हैं। इससे उसे लगातार दर्द बना हुआ है। दैनिक कामों में भी उसे परेशानी हो रही है। डॉक्टरों ने उसे भी जोड़ प्रत्यारोपण कराने की सलाह दी है। कहा है कि यही अंतिम विकल्प है।
कोरोना से ठीक होने वाले मरीजों में ब्लैक फंगस के बाद बोन डेथ बड़ी समस्या बनकर उभरी है। इस बीमारी के काफी मरीज सामने आने लगे हैं। एक शोध में सामने आया है कि कोरोना संक्रमितों में डेढ़ से दो प्रतिशत हो यह बीमारी हो रही है। ऐसे में झांसी में ही 400 से ज्यादा और बुंदेलखंड में 1000 मरीज बोन डेथ के हैं। 50 की हड्डियां गलने लगी हैं। समय पर इलाज जरूर कराएं। - डॉ. अमित सहगल, अस्थि रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज।
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