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झांसी की खूबसूरती नहीं देखी तो आपने कुछ नहीं देखा

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If you dont see jhansi beautiful than you dont see anythings
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झांसी। दूर तक फैले हरेभरे जंगल, ऊंचे-ऊंचे पहाड़, कल- कल बहती बेतवा, पहूज, ऐतिहासिक पुरातात्विक धरोहरें, झीलें, झरना, सभी कुछ तो है झांसी व उसके आसपास। ओरछा, दतिया, टीकमगढ़ धार्मिक दृष्टि से भी परिपूर्ण है। यहां प्रदूषण भी नहीं है। बारिश में तो बुंदेलखंड हरा परिधान सा पहन लेता है। पहाड़ों पर हरियाली हर किसी को मोह लेती है। आपने झांसी, ललितपुर के अलावा बुंदेलखंड की खूबसूरती नहीं देखी, तो कुछ भी नहीं देखा। आप एक बार आइये, बार - बार आने का मन करेगा।
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वीरों की इस धरा पर प्राकृतिक छटा जगह - जगह बिखरी हुई है। वीरता के साथ- साथ धार्मिक, पुरातत्व एवं ऐतिहासिक संपदा की यहां भरमार है। छोटी - बड़ी झीलें, बांध और तालाब के अलावा पुरानी कलात्मक इमारतें हैं, जो अपने गौरव का बखान करती हैं। पर्यटकों को रिझाती हैं।
रानी लक्ष्मीबाई का ऐतिहासिक किला
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण साक्षी झांसी का ऐतिहासिक किले का निर्माण ओरछा के राजा वीर सिंह जूदेव ने 1613 में कराया था। यह किला बुंदेलों, मुगलों, मराठा और अंग्रेजों के आधिपत्य में रहा। लगभग 49 एकड़ में फैले इस किले में गंगाधर राव की बारादरी, शिव मंदिर, पंचमहल आदि हैं। वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई एवं अन्य वीरों तथा वीरांगनाओं के शौर्य का यह किला अहम गवाह है।
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अद्भुत कलाकृतियां हैं राजकीय संग्रहालय में
ऐतिहासिक दुर्ग के पहले राजकीय संग्रहालय है। वर्ष 1978 में इसकी स्थापना हुई थी। संग्रहालय में 17 हजार से अधिक दुर्लभ कलाकृतियों का संग्रह है। इनमें धातु, पाषाण मूर्तियां, चित्र, शिलालेख, ताम्रपत्र, मुहरें आदि हैं। साथ ही एक दर्जन से अधिक वीथिकाएं हैं, जिनमें जैन, बौद्ध,, शैव, वैष्णव धर्म की प्राचीन मूर्तियां रखी हुई हैं।
खूबसूरत है जराय का मठ
झांसी से लगभग 20 किलोमीटर दूर झांसी खजुराहो मार्ग पर बरुआसागर से पहले जराय का मठ है। यह मंदिर नौ वीं सदी का माना जाता है, जो प्रतिहार काल में बना था। मंदिर की बाहरी दीवारों पर नवग्रह तथा देवी देवताओं की मूर्तियों हैं। इस मंदिर को खजुराहो के मंदिर के रूप में भी देखा जाता है। कई पर्यटक इसे देखने के लिए आते हैं।
बांध में है लंबी सुरंग
झांसी - ललितपुर राष्ट्रीय मार्ग पर बबीना से लगभग 9 किलोमीटर की दूरी पर बेतवा नदी पर सुकुवां ढुकुवां बांध का निर्माण वर्ष 1909 में कराया गया था। इस बांध में एक छोर से दूसरे छोर तक जाने के लिए लगभग एक किलोमीटर की लंबी सुरंग है। इसमें जगह - जगह मेहराबदार खिड़कियां बनी हैं। बरसात में एक किलोमीटर का जल प्रपात बन जाता है जो इन खिड़कियों से देखना एक साहसिक एवं रोमांचक अनुभव है।
सुरम्य पहाड़ियों के बीच में है गढ़मऊ झील
झांसी से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ियों के बीच में गढ़मऊ झील है। लगभग 10 वर्ग किलो मीटर के क्षेत्रफल में फैली इस झील में हमेशा पानी भरा रहता है। सर्दियों में देश के विभिन्न हिस्सों से आकर्षक पक्षी यहां विहार के लिए आते हैं। यहां पर्यटन विभाग ने कई कार्य कराये हैं।
आकर्षक है राजा गंगाधर राव की छतरी
लक्ष्मी तालाब के तट पर राजा गंगाधर राव की छतरी है। इसे राजा गंगाधर राव की समाधि भी कहा जाता है। इसका निर्माण रानी लक्ष्मीबाई ने स्वयं कराया था। मराठा और मुगल शैली में बनी इस छतरी के चारों ओर उद्यान हैं। स्मारक में चूने के मसाले से विभिन्न आकृतियां बनायी गई हैं। यह छतरी पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित है।
माताटीला और पारीछा बांध भी आकर्षक
बेतवा नदी पर माताटीला बांध बना हुआ है। यह पिकनिक स्पॉट भी है। बरसात में इस बांध को देखने के लिए दूर - दूर से लोग आते हैं। इसी प्रकार से बेतवा नदी पर पारीछा बांध बना हुआ है। इस बांध पर उद्यान एवं पिकनिक स्पॉट है।
केवड़ा की खुशबू लिए है नारायण बाग
लक्ष्मी तालाब के समीप नारायण बाग में लगभग दो सौ वर्ष पुराना केवड़ा का बाग है। बरसात के उपरांत बाग में केवडे़ के फूल एवं खुशबू लोगों को आकर्षित करते हैं। नारायण बाग में कई उद्यान हैं जिनमें देशी - विदेशी फूल उद्यान के वातावरण को बेहद सुगंधमय और सुंदर बनाते हैं।
अनुपम है देवगढ़
ललितपुर के जिला मुख्यालय से लगभग 33 किलो मीटर दूर बेतवा नदी की घाटी में प्राकृतिक सुंदरता से लबालब है देवगढ़। यहां गुप्तकालीन दशावतार मंदिर के साथ ही 31 जैन मंदिरों की श्रृंखला है। इसके अलावा बौद्ध की गुफायें, सिद्ध की गुफा, राजघाटी, नाहर घाटी, महावीर स्वामी वन्य जीव विहार आदि हैं। देवगढ़ में देश - विदेश से सैलानी आते हैं।
दुधई में है अद्भुत मंदिर और मूर्तियां
ललितपुर के पाली से लगभग सात किलोमीटर दूर दुधई के जंगल में भगवान नरसिंह की अत्यंत प्राचीन रॉक कट प्रतिमा है। यह प्रतिमा चट्टान काटकर बनाई गई है। दुधई में ही सूर्य मंदिर, शिव मंदिर और 64 योगिनी मंदिर भी है। सूर्य एवं शिव मंदिर की वास्तुकला अद्वितीय है। पाषाण से बनी वाराह भगवान की मूर्ति भी अपने आप में विशेष है।
खजुराहो की वास्तुकला देखें भंडारिया महादेव मंदिर में
ललितपुर के जाखलौन रेलवे स्टेशन से लगभग 11 किलोमीटर की दूरी पर है चांदपुर - जहाजपुर। चांदपुर में 11 वीं सदी का भंडारिया महादेव मंदिर वास्तुकला में खजुराहो के कंदरिया महादेव मंदिर के समान है। खजुराहो की श्रृंगारिक मूर्तियां यहां भी देखी जा सकती हैं। इसी मंदिर के समीप ही चंदेलकालीन विष्णु मंदिर, वाराह मंदिर, जैन मंदिर आदि हैं।
द्वापर युग का है ललितश्वेरी देवी का मंदिर
शहजाद नदी पर बने गोविंद सागर बांध के निकट अति प्राचीन ललितेश्वरी देवी का मंदिर है। मान्यता है कि यह मंदिर द्वापर काल का है। इस मंदिर में कई जगहों से लोग आते हैं। इसी प्रकार से रणछोड़ जी का चंदेलकालीन मंदिर, मुचुकुंद की गुफा, मदनपुर के मंदिर, पाली में नील कंठेश्वर का मंदिर, पांडव वन की गुफाएं आकर्षण का केंद्र है।

झांसी के राजा गंगाधर राव की छतरी। अमर उजाला

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