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Jhansi News: नौ रसों का राजा है हास्य, हंसी के बिना जिंदगी वीभत्स

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अमर उजाला कार्यालय में खास साक्षात्कार देते अ​भिनेता राजपाल&
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झांसी। “नौ रसों का राजा हास्य है। हंसी के बिना जिंदगी वीभत्स है। हंसी सम्राट है और मनोरंजन एक विज्ञान, जिसका मैं विद्यार्थी हूं।” अपने सहज अंदाज में जिंदगी और कला का फलसफा बयां करते हुए फिल्म अभिनेता राजपाल यादव ने कहा कि उनके लिए हर दिन सीखने, नई शुरुआत करने और कुछ नया होने का अवसर है। बृहस्पतिवार को अमर उजाला कार्यालय में विशेष साक्षात्कार के दौरान उन्होंने सिनेमा, हास्य, अभिनय, बदलते दौर के मनोरंजन और बुंदेलखंड से अपने जुड़ाव पर खुलकर बात की।
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राजपाल यादव के लिए अभिनय का सफर संघर्ष की कहानी भर नहीं, बल्कि हर दिन खुद को नए सिरे से शुरू करने का सिलसिला है। उन्होंने कहा कि वह अपने कॅरिअर के शुरुआती दौर को भी संघर्ष के बजाय सीखने की यात्रा के रूप में देखते हैं। उनका विश्वास वर्तमान में जीने में है। उनके मुताबिक, अतीत कभी पूरी तरह जाता नहीं और भविष्य कभी सामने नहीं आता। दोनों वर्तमान के रूप में ही हमारे जीवन में मौजूद रहते हैं। इसलिए वह हर दिन को एक नए अवसर की तरह जीना चाहते हैं।

मनोरंजन की अपनी-अपनी दुनिया, हर दौर के हैं दर्शक
ओटीटी प्लेटफॉर्म पर पेश की जा रही कॉमेडी और उसमें मौलिकता के सवाल पर राजपाल यादव ने मनोरंजन के व्यापक स्वरूप की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि मनोरंजन की कई परतें हैं और यह हजारों वर्षों से अलग-अलग रूपों में मौजूद रहा है। इसमें विशिष्ट वर्ग के लिए होने वाला मनोरंजन भी है और आम जनमानस का मनोरंजन भी। उनके अनुसार, मनोरंजन की किसी एक शैली को चुनौती देकर खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि हर तरह के मनोरंजन के अपने दर्शक होते हैं।
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नाना पाटेकर से दो दशक का साथ, अभिनय से आगे भी बहुत कुछ
अभिनेता नाना पाटेकर के साथ करीब 20 साल के सफर को याद करते हुए राजपाल यादव ने कहा कि नाना पाटेकर ने अपने अभिनय से विशिष्ट पहचान बनाई, लेकिन उनकी सेवा और शौक के कई पहलू हमेशा पर्दे के पीछे रहे। उन्होंने नाना पाटेकर को भारतीय सिनेमा का पथ-प्रदर्शक कलाकार बताया। राजपाल यादव ने उनके व्यक्तित्व और योगदान को याद करते हुए उन्हें अमर शख्सियत के रूप में वर्णित किया।

बुंदेली में फिल्म बनाने का सपना
बुंदेलखंड की धरती से अपने लगाव का जिक्र करते हुए राजपाल यादव ने कहा कि यहां की सरलता, सरसता और सकारात्मकता उन्हें प्रभावित करती है। वह बुंदेलखंड की पृष्ठभूमि पर फिल्म बनाना चाहते हैं। बुंदेली भाषा में फिल्म बनाने की उनकी योजना भी थी, लेकिन कोरोना महामारी के कारण उस पर आगे काम नहीं हो सका। उन्होंने बुंदेलखंड के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करते हुए यहां की मिट्टी और संस्कृति को खास बताया।

मशीनों के दौर में भी जिंदा रहेगी कला
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीनीकरण के बढ़ते प्रभाव पर राजपाल यादव ने कहा कि इनके कारण कलात्मक फिल्मों के स्वरूप और निर्माण पर असर पड़ा है, लेकिन कला का महत्व कभी समाप्त नहीं होगा। उन्होंने कहा कि कलात्मक फिल्में फैशन की तरह बदलते समय के साथ नए रूप लेती हैं। कलयुग कला और मशीनों का युग है, जिसमें प्रयोग और आविष्कार लगातार जारी हैं। उनके मन में एक-दो नहीं, बल्कि करीब एक दर्जन कलात्मक फिल्में बनाने की इच्छा है। उनके मुताबिक, तकनीक और समय बदल सकते हैं, लेकिन कला की संभावनाएं हमेशा बनी रहती हैं।
15 साल की आयु में अमर उजाला ने छापी थी पहली तस्वीर
-राजपाल ने कहा कि जब वह 15 साल के थे, तब अमर उजाला में उनका पहला फोटो छपा था। उस समय वह हिमाचल प्रदेश के सोलन में नाटक करने के लिए टीम के साथ जा रहे थे। उन्होंने कहा कि तब मुझ पर अमर उजाला की पहली नजर पड़ी थी, इसके लिए मैं हमेशा अखबार का ऋणी रहता हूं। कहा कि उनका शुरू से ही अमर उजाला से लगाव रहा है।
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