झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में बागवानी के काम में बड़ा गड़बड़झाला सामने आया है। कार्यदायी संस्था को जितने क्षेत्रफल का भुगतान किया जाता रहा, उससे दस हजार स्क्वायर मीटर कम एरिया में बागवानी का काम हुआ। मामला संज्ञान में आने पर कुलपति ने फर्म के भुगतान पर रोक लगाते हुए जांच कमेटी का गठन कर दिया है।
बीयू में 63160.85 स्क्वायर मीटर क्षेत्र में बागवानी के लिए निविदा निकाली गई थी। टेंडर मिलने के बाद मेरठ की फर्म ने बागवानी का कार्य शुरू कर दिया। चूंकि, निविदाओं में अंकित मात्रा केवल अनुमानित होती है, इसलिए साइट पर निष्पादित मात्रा ही प्रत्येक माह बिल पर अंकित की जानी चाहिए। फर्म द्वारा निविदा में अंकित क्षेत्रफल के सापेक्ष महज 53211 स्क्वायर मीटर पर ही बागवानी का कार्य किया गया। इसमें गड़बड़ी के संकेत मिलने के बाद कुलपति ने इंजीनियरिंग विभाग के डीन व जेई को कार्य की जांच के निर्देश दिए। जांच में दस हजार स्क्वायर मीटर पर बागवानी का कार्य न होने के बावजूद भुगतान का मामला सामने आया।
इसके अलावा कुलपति आवास, वित्त अधिकारी आवास, बायोमेडिकल विभाग, इनोवेशन सेंटर, स्वास्थ्य केंद्र समेत विभिन्न स्थानों पर लोन, पार्क ठीक स्थिति होने, लेकिन इसके अतिरिक्त समस्त परिसर में घास में खरपतवार उग आने की बात सामने आई। पार्क में कई स्थानों पर घास नहीं मिली। इसकी विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर कुलपति को सौंपी गई, जिस पर उन्होंने जांच के निर्देश दे दिए हैं।
महीने की चोट तीस हजार रुपये
साइट पर उपलब्ध क्षेत्रफल पर बागवानी के लिए तीन रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर व पार्कों में लगने वाले पौधों हेतु दस हजार रुपये प्रतिमाह के हिसाब से भुगतान होता है। चूंकि, बागवानी 53,211 स्क्वायर मीटर क्षेत्रफल पर हुई है, इसलिए प्रतिमाह 1,59,633 रुपये का भुगतान किया जाना चाहिए। वहीं, पार्क में लगाए जाने वाले पौधों का भुगतान जोड़कर कुल योग 1,74,633 रुपये हो जाता है। बताया गया कि निविदा के दौरान कार्यदायी संस्था ने प्रतिमाह दस हजार रुपये छूट की बात पर रजामंदी जताई थी, इसलिए भुगतान 1,64,633 रुपये होना चाहिए था लेकिन फर्म को दस हजार स्क्वायर मीटर अधिक क्षेत्रफल जोड़कर 1,94,482 रुपये के हिसाब से भुगतान किया गया। इस हिसाब से विश्वविद्यालय को हर माह तीस हजार रुपये की चोट लगती रही।
पांच माह से कमेटी दे रही ‘ओके’ रिपोर्ट
बागवानी के कार्य की देखरेख के लिए सहायक अभियंता सिविल के अलावा दो वरिष्ठ प्रोफेसरों की कमेटी का गठन किया गया था। मार्च 2015 से जुलाई तक लगातार कमेटी द्वारा लगातार फर्म को क्लीन चिट देते हुए संतोषजनक कार्य का प्रमाणपत्र दिया जा रहा है। इस पर कमेटी भी सवालों के घेरे में खड़ी हो गई है।
‘मामले की शिकायत मिलने पर जांच के लिए चार सदस्यीय कमेटी का गठन कर दिया गया है। हर बिंदु की जांच कराई जाएगी। जो भी दोषी मिलेगा, उसको बख्शा नहीं जाएगा।’ - प्रो. अविनाश चंद्र पांडेय, कुलपति।