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ओरछा में चल रही रामलीला का चौथा दिन, रामजी के वनवास और केवट प्रसंग का हुआ मंचन

Thu, 07 Apr 2022 10:45 PM IST
Vikas Kumar अमर उजाला ब्यूरो, ओरछा

सार

कैकेई भरत को दो वरदान मांगने वाली बात बताती है। भरत को राज्य और रामजी को वनवास वाले दोनों वरदान की बात सुनकर भरत बिलख बिलख कर रोये और अपनी मां को कोसने लगे।
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ओरछा में आयोजित रामलीला - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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ओरछा, पर्यटन एवं धार्मिक नगरी ओरछा में चल रही रामलीला के चौथे दिन गुरुवार को रामकथा का मंचन भगवान श्रीराम, मैया सीता और लक्ष्मणजी की आरती से प्रारंभ हुआ। आज श्रीराम-निषादराज मिलन, केवट प्रसंग, दशरथ देवलोक गमन, भरत-कैकई संवाद का मंचन हुआ। 

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प्रसंग की शुरूआत सीता और रामजी के वन में चल रहे जीवन से हुई। जिनका आज राज्याभिषेक होने वाला था वो भगवान श्रीराम पत्थर के सिराहने और रेत के बिछौने पर सो रहे थे। भगवान श्रीराम को ऐसी अवस्था में देख लक्ष्मणजी की आंखों से आंसू बह निकले। अवधवासी भगवान श्रीराम को अवध छोड़ कर नहीं जाने देने की जिद पर अड़े थे, लेकिन भगवान श्रीराम को पिता को दिया हुआ वचन निभाना था। इसलिए भगवान श्रीराम अवधवासियों को सोता हुआ छोड़ कर वन की तरफ प्रस्थान कर जाते हैं। रास्ते में गंगाजी पड़ती हैं, भगवान श्रीराम सीताजी और लक्ष्मण को गंगाजी के गौरव के बारे में बताते हैं। यहीं पर प्रभु श्रीराम और निषादराज का मिलन होता है। 

श्रंगपुर नामक छोटे से गांव, भीलों की बस्ती, यहां पर दीन हीनों से प्रभु मिलन की अनोखी घटना घटी। भगवान श्रीराम को देख सभी लोग खुश हो जाते हैं और उनका जय जयकार करने लग जाते हैं। इसके बाद केवट प्रसंग को भी बहुत खूबसूरती से दिखाया गया। 
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केवट भगवान श्रीराम को गंगा के उस पार छोड़ने के बदले में उनके चरण धोने की अनुमति मांगता है। रामजी के चरण धोने के बाद केवट अपना वादा निभाता है और भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को गंगा के उस पार उतारता है। इसके आगे का भावुक प्रसंग देख दर्शकों की आंखे नम हो गई। वो प्रसंग था गंगा के पार छोड़ने के बाद का। गंगा पार उतरने के बाद भगवान श्रीराम असमंजस में पड़ जाते हैं कि केवट को इसके बदले में क्या दिया जाए। इस बारे में रामजी बहुत सोचते हैं, तब सीताजी ने अपनी अंगुली से अंगूठी निकालकर केवट को भेंट की। 

सीताजी ने कहा कि यह वो मुद्रिका है जिसे एक बार अवध में पिताश्री ने मांगा था और मैंने यही कहा था कि ये राम नाम की अंकित मुद्रिका मेरे प्राण हैं, इसे दूंगी तो दुविधा में पड़ जाउंगी, इस कारण उन्हें मैं यह मुद्रिका नहीं दे पाई। सीताजी ने इस मुद्रिका को ग्रहण करने के लिए केवट को योग्य पात्र बताया। केवट उतराई लेने से साफ मना कर देता है और कहता है कि मैया सीता के सभी आभूषण उतर गए है मैं इतना भी कठोर नहीं हूं कि बचे हुए आभूषण भी उतरवा लूं। 

इसके बाद दशरथ देवलोक गमन दिखाया गया। भगवान श्रीराम के वियोग में राजा दशरथ का अंत समय नजदीक आ जाता है। इस अंत समय में राजा दशरथ को श्रवण के माता-पिता दिखाई देते हैं। भगवान श्रीराम के वियोग में राजा दशरथ हे राम हे राम करते-करते देवलोक गमन कर जाते हैं। भरत के वापस अवध आने पर वो कैकई से मिलते हैं और रामजी, सीताजी, लक्ष्मण और पिता को नहीं पाने पर उनके बारे में पूछते हैं। कैकई भरत को उनके पिता के स्वर्गवास की बात बताती है। 

कैकेई भरत को दो वरदान मांगने वाली बात बताती है। भरत को राज्य और रामजी को वनवास वाले दोनों वरदान की बात सुनकर भरत बिलख बिलख कर रोये और अपनी मां को कोसने लगे।

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