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Jhansi News: दो साल बाद भी बीएनएस की धाराओं में उलझे मुंशी और दरोगा

Wed, 01 Jul 2026 03:01 AM IST
झांसी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, झांसी
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झांसी। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) लागू हुए दो साल पूरे हो गए हैं, लेकिन थानों के रोजमर्रा के कामकाज में अभी भी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की पुरानी धाराओं का प्रभाव कायम है। नई धाराओं को समझने में थानों के मुंशी और दरोगा अब भी उलझ रहे हैं। यही वजह है कि प्राथमिकी दर्ज करने और केस डायरी तैयार करने में उन्हें कई बार आईपीसी की धाराओं का सहारा लेना पड़ रहा है।
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1 जुलाई 2024 को 162 साल पुरानी आईपीसी की जगह बीएनएस लागू हुई थी। इतने लंबे समय तक आईपीसी की धाराएं पुलिसकर्मियों के साथ आम लोगों की जुबान पर भी थीं। धारा 420, 147, 376, 302, 307 और 380 जैसी धाराएं अपराधों की पहचान बन चुकी थीं। थाना स्तर पर एफआईआर दर्ज करने वाले मुंशी और विवेचना करने वाले दरोगा भी इन धाराओं से पूरी तरह परिचित थे।
बीएनएस लागू होने के बाद अपराधों की धाराएं और उनका क्रम बदल गया। अब नई धाराओं को याद करने और अपराध की प्रकृति के अनुसार सही धारा लगाने में पुलिसकर्मियों को परेशानी हो रही है। कई थानों में आज भी मुंशी के सामने आईपीसी की धाराओं के चार्ट लगे हुए हैं। हालांकि मारपीट, गाली-गलौज, हत्या, हत्या का प्रयास और दुष्कर्म जैसे मामलों में पुलिसकर्मी नई धाराओं से कुछ हद तक परिचित हो चुके हैं।
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जानकारों के मुताबिक बीएनएस में अपराध की प्रकृति के आधार पर धाराओं का निर्धारण किया गया है। इस वजह से पुराने कानून की तरह सीधे धारा पहचानना आसान नहीं है। केस डायरी तैयार करने में भी पुलिसकर्मियों को नए प्रावधानों को समझने में समय लग रहा है।
एसएसपी बीबीजीटीएस मूर्ति ने बताया कि नए कानून को लेकर पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण दिया गया है। समय-समय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें अपडेट किया जाता है।

यह हुए कानून में बदलाव
1 जुलाई 2024 से बीएनएस लागू होने के बाद आईपीसी की 511 धाराओं की जगह बीएनएस में 358 धाराएं शामिल की गईं। इसके साथ ही धाराओं का क्रम भी बदल गया। सीआरपीसी की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) लागू हुई। सीआरपीसी में 484 धाराएं थीं, जबकि बीएनएसएस में 531 धाराएं हैं। वहीं भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872 की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम-2023 लागू हुआ, जिसमें पुराने 167 प्रावधानों की जगह 170 प्रावधान किए गए हैं।

अभी बनी हुई हैं ये चुनौतियां
तकनीकी और संसाधनों की कमी
नए कानून में साक्ष्यों की वीडियोग्राफी अनिवार्य की गई है, लेकिन कई थानों में पर्याप्त तकनीकी संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। डिजिटल साक्ष्य जुटाने में भी दिक्कत आ रही है।

ई-एफआईआर में देरी
इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से शिकायत दर्ज कराने की सुविधा दी गई है, लेकिन शिकायतकर्ता को तीन दिन के भीतर थाने पहुंचकर हस्ताक्षर करना जरूरी है। इसके बाद ही आगे की कार्रवाई शुरू हो पाती है।

प्रारंभिक जांच का प्रावधान
बीएनएस की धारा 173(3) के तहत सात साल तक की सजा वाले मामलों में पुलिस को 14 दिन तक प्रारंभिक जांच करने का अधिकार मिला है। जानकारों का कहना है कि कई बार इस प्रावधान के कारण मुकदमा दर्ज करने में देरी की शिकायतें भी सामने आती हैं।
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