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गरीबों के बैंक खातों का इस्तेमाल कर रहे हैं साइबर अपराधी

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झांसी। ठगी की वारदात को अंजाम देने के लिए साइबर अपराधी गरीबों के बैंक खातों का इस्तेमाल कर रहे हैं। चंद रुपयों की लालच देकर वे उन्हें अपने जाल में फंसा लेेते हैं। खाताधारक को मालूम ही नहीं होता है कि वे किसी आपराधिक वारदात का हिस्सा बनने जा रहे हैं। साइबर ठगी के अस्सी फीसदी मामले में पुलिस के सामने ये तथ्य सामने आया है।
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एटीएम कार्ड का नंबर, पिन नंबर व अन्य जानकारियां हासिल कर खाते से रकम उड़ाना आम बात हो गई है। इसके अलावा कभी नौकरी के नाम पर युवाओं को ठगा जाता है, तो कभी फेसबुक आईडी हैक कर साइबर अपराधी रकम समेट लेते हैं। इन सब घटनाओं को अंजाम तक पहुंचाने के लिए बैंक खाते का इस्तेमाल किया जाता है। पकड़े जाने से बचने के लिए साइबर अपराधी अपने बैंक खाते का इस्तेमाल नहीं करते, बल्कि गरीबों को झांसा देकर वे उन्हें अपने जाल में फंसा लेते हैं। उनसे बैंक खाते का पूरा ब्योरा और एटीएम कार्ड हासिल कर लेते हैं। इसके आधार पर नेट बैंकिंग की सुविधा भी वे ले लेते हैं। जबकि, खाताधारक को इसकी जानकारी नहीं होती है। उसे तो केवल इतना बताया जाता है कि कुछ रकम उसके खाते में आएगी, जिसे वे निकाल लेंगे। इसके बदले में खाताधारक को तीन-चार हजार रुपये थमा दिए जाते हैं। ये धनराशि भी उसके खाते में छोड़ दी जाती है।
साइबर अपराध की जांच में पुलिस के सामने सबसे अहम जानकारी बैंक खाता ही होती है। साइबर पुलिस बैंक से खाताधारक की जानकारी लेकर उसके पास पहुंचती है, तो पता चलता है कि साइबर अपराध के बारे में उसे जानकारी ही नहीं है। उसने तो चंद रुपयों की खातिर अपना खाता किसी को किराये पर देखा रखा है। साइबर अपराध के अस्सी फीसदी मामलों में यही बात सामने आती है।
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सामने नहीं आते, फोन पर लेते हैं फांस
झांसी। साइबर अपराधी जिन लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं, उनसे उनका कभी आमना-सामना नहीं होता है। फोन कॉल के जरिये वे ऐसे लोगों को फांस लेते हैं। साइबर सेल प्रभारी नीरज कुमार ने बताया कि साइबर अपराधियों के टारगेट पर वे लोग होते हैं, जिनके खाते में रकम के नाम पर चंद रुपये ही जमा रहते हैं और कभी कभार ही ट्रांजेक्शन होता है। एक-दो बार खातों को इस्तेमाल करने के बाद साइबर ठग अपना दूसरा शिकार तलाश लेते हैं।
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