झांसी। जनपद की गोशालाओं से हजारों गायें अचानक लापता हो गईं हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर खुली गोशालाओं का अगर रिकार्ड देखेंगे तो किसी में 100 गोवंश हैं तो किसी में 150 । लेकिन सोमवार को जब अमर उजाला की टीम ने पड़ताल की तो गोशालाएं खाली थीं। अब यह गोवंश कहां चला गया इसकी जानकारी देने वाला भी कोई नहीं। ग्राम पंचायत स्तर पर जो कमेटी है वह चुनाव में लगी है और अधिकारी भी इलेक्शन में व्यस्त हैं। कोई भी यह नहीं जानता कि गोवंश चला कहा गया है। कुछ जगहों पर ग्रामीणों ने जरूर कहते सुने गए कि चारा-पानी का कोई बंदोबस्त था नहीं लिहाजा कमेटी के लोगों ने गोवंश को गोशाला से छोड़ दिया है।
जिले में 197 ग्रामीण गोआश्रय स्थल, 18 नगरीय गोआश्रय स्थल, दो गोवंश वन्य विहार, एक कान्हा उपवन, 22 कांजी हाउस और चार स्थायी आश्रय स्थल हैं। इनमें से ग्रामीण क्षेत्र में बने गो आश्रय स्थलों का बुरा हाल है। चुनाव से पहले इन आश्रय स्थलों की देखरेख ग्राम प्रधानों के जिम्मे थी, लेकिन ग्राम प्रधानों का कार्यकाल पूरा हो जाने के कारण अब इन आश्रय स्थलों की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत सचिव के हाथों में है। लेकिन कोई जिम्मेदारी नहीं निभा रहा। बबीना ब्लाक के ग्राम अठोंदना में 44 गोवंश, मथुरापुुरा में 120 गोवंशं, मुरारी में 92 गोवंश और बलौरा में 48 गोवंश की देखरेख के लिए अस्थायी गोशालाएं बनाई गई हैं। परंतु इन गोशालाओं में एक भी गोवंश नहीं है। गांवों से तीन से चार किलोमीटर की दूरी पर गोआश्रय स्थल बने हैं। गांव से दूरी अधिक होने के कारण यहां कोई आता - जाता नहीं है। इस कारण गो आश्रय स्थलों पर सन्नाटा पसरा है। न कोई गाय है और न कोई गायों की देखरेख करने वाला। हां, ग्रामीणों ने इतना जरूर कहा कि जब कोई साहब जांच करने आता है तो आसपास की गायों को हांक कर गोशाला में बंद कर दिया जाता है।
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70 से अधिक नही रख सकते
ग्राम मथुरापुरा के ग्रामीणों ने बताया कि गांव में बहुत से अन्ना जानवर घूमते हैं। फसलों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं, यदि प्रधान से कहो कि इन जानवरों को गोआश्रय स्थल में पकड़वा दो तो इंकार कर दिया जाता था। ग्रामीणों से कहा जाता था कि 70 से अधिक जानवर यहां नहीं रख सकते हैं। क्योंकि इसकी क्षमता फुल हो गई है। हालांकि, जब ग्रामीणों को बताया गया कि मथुरापुरा की सूची में 120 गोवंश हैं तो सभी अवाक रह गए।
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चारा और भूसा के लिए पांच सौ रुपये प्रतिमाह
गायों को चारा, भूसा और पानी का इंतजाम करने के लिए पांच सौ रुपये प्रतिमाह दिया जाता है। अमर उजाला ने चार गोशालाओं की पड़ताल की। कागजों के अनुसार इसमें कुल जानवरों की संख्या 304 है, जबकि मौके पर एक भी जानवर नहीं पाया गया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस तरह से पैसे का दुरुपयोग किया जा रहा है।
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गोशाला के नाम पर खा गए भूसा
गांवों में गोशाला की देखरेख नहीं होने और छुट्टा जानवर खुलेआम खेतों में घूमने और फसलों को नुकसान करने से ग्रामीण काफी नाराज हैं। चुनाव के दौरान ग्रामीणों के मुंह पर एक ही बात है कि गोशाला के नाम पर भूसा और चारा तक का पैसा खा लिया है। फिर भी जीतने का सपना देख रहे हैं। इनको भगवान सबक सिखाएगा।
अभी चुनाव चल रहा है, गायों को कौन पूछ रहा है लेकिन गायों के साथ धोखाधड़ी नहीं करनी चाहिए। गाय को माता माना गया है। हमें गाय के नाम पर ईमानदारी बरतनी चाहिए।
- श्रीकृष्ण तिवारी, ग्राम मुरारी
गोशाला का महीनों से ताला नहीं खुला है। गोशाला देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां की हकीकत क्या है। अब चुनाव चल रहा है, जनता सब देख रही है।
- बृजेश द्विवेदी, ग्राम मुरारी
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गायें दिन भर के लिए छोड़ दी जाती हैं। शाम को वापस आ जाती हैं। पीने के पानी का इंतजाम है। अभी तो चुनाव चल रहा है, इसलिए गायों की ओर किसी का ध्यान नहीं है।
- बलवान सिंह, ग्राम अठोंदना
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गांव के लोग इन दिनों फसल की कटाई के काम में व्यस्त हैं। चुनाव भी चल रहा है। इसलिए गायों की चिंता कोई नहीं कर रहा है। छुट्टा गायें फसलों को बहुत नुकसान पहुंचाती हैं।
- अशोक यादव, ग्राम अठोंदना
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वर्जन
चुनाव की व्यस्तता के कारण अभी विभागीय कार्य नहीं देख पा रहा हूं। जल्द ही गोशालाओं का निरीक्षण किया जाएगा।
- डा. योगेंद्र सिंह तोमर, पशु चिकित्सा अधिकारी