झांसी। बुंदेलखंड की धरती पर जन्मे रामचरण हयारण मित्र उस दौर के कवि थे जब मैथिली शरण गुप्त, वृंदावन लाल वर्मा जैसे साहित्यकार खड़ी बोली में रचनाएं लिखकर हिंदी के विकास में योगदान कर रहे थे। मित्र जी ने बुंदेलखंड के वीर और वीरांगनाओं की शौर्य गाथाओं पर जो रचनाएं लिखीं हैं वह बुंदेलखंड के गली चौपालों तक पहुंचकर जन जन की कविता बन र्गइं। ओरछा दर्शन में लिखी गई कविता बेतवा काफी समय तक मध्यप्रदेश के माध्यमिक शिक्षा मंडल के पाठ्यक्रम में शामिल रही। महारानी लक्ष्मी बाई और छत्रसाल पर लिखी गई काव्य रचनाओं में उन्होंने हिंदी, ब्रज और बुंदेली का समान रूप से समावेश किया है। वीररस की इन कविताओं को कवित्त की विधा में लिखा गया है।
होम दिए प्रान पै बचाई लाज झांसी की...
इतिहासकार हरगोविंद कुशवाहा बताते हैं कि रामचरण हयारण मित्र ने अपने काव्य में महारानी लक्ष्मीबाई के 1857 के युद्ध का जो चित्र खींचा है उसे पढ़कर ओज का संचार हो जाता है। उन्होंने लिखा है, धर विकराल वेष केसन समारि वेग, पूज चंडिका कौं दिव्य मूर्ति चंडिकासी की। अश्व हो सवार दांतों में लगाम दाव, हाथों में कृपान गह शत्रु सेन नासी की। चारु चंद्र चंचला सी, चंद्रिका सी वीर बाईसाब, होम दिए प्रान पै बचाई लाज झांसी की। भारत की आजादी को सुरक्षित रखने के लिए रामचरण हयारण मित्र ने अपनी कविता की माध्यम से संदेश दिया। लाज रहे मान मातृ भू का तुम्हें सौंपा गया। ठान ठसकीलों की ठसक ठकुराने की । तोप तलवारों के न भय में आना भूल, बान रहे सिंहनी के सिंह कहलाने की।
भोर सौं सांझ लौं, सांझ सौं भौर लौं केशव कौ जस गाउती...
हिंदी के प्रवक्ता उदय त्रिपाठी बताते हैं कि रामचरण हयारण मित्र की कविताओं में बुंदेलखंड के ऐतिहासिक पात्रों का वर्णन मिलता है। छत्रसाल, हरदौल से लेकर महाकवि केशव और रायप्रवीण को भी उन्होंने अपने साहित्य में स्थान दिया। उन्होंने अपनी कविता बेतवा में लिखा है, चैत चांदनी हो चारु, चंद्रवदनी हो शुभ्र , फूली हो करौंदी, बेतवा की सुधा धारा हो। स्वर्ण धारा बन जाती वीर सिंह जू की, वहीं छत्रसाल का दुधारा बन जाती है। लाज संभारि के रायप्रवीन की बीन सुरीली बजाउती हो तुम, भोर सौं सांझ लौं, सांझ सौं भौर लौं केशव कौ जस गाउती हो तुम। मित्र जी ने वीर रस से लेकर श्रृंगार तक अपनी कविताओं को सजाया है। उनके बारे में कहा जाता है उन्होंने अपने साहित्य में हिंदी, ब्रज और बुंदेली को समान रूप से स्थान दिया।