कोविड प्रकोप के बाद जिस तेजी से प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में तुलसी, अश्वगंधा, गिलोय जैसे औषधीय पौधों का इस्तेमाल शुरू हुआ है, उसका असर इनकी खेती पर भी देखने को मिल रहा है।
बुंदेलखंड, खास तौर से झांसी में तुलसी की खेती करने वाले किसानों के साथ ही रकबे में भी इजाफा हुआ है। तुलसी के साथ ही यहां मेंथी, एलोवेरा जैसी औषधीय महत्व के पौधे भी बड़ी मात्रा में उगाए जा रहे हैं। इनको बड़ी कंपनियां सीधे किसानों से अच्छी कीमत पर खरीद रही हैं।
पिछले करीब छह माह से पूरा देश कोविड महामारी की चपेट में है। इस दौरान प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने पर खास जोर दिया जा रहा है। आयुर्वेद में तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा आदि को प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाला माना गया है।
इस वजह से बाजार में इनकी मांग भी बढ़ी है। पिछले वर्ष ब्लॉक बंगरा, मऊरानीपुर, गौराठा में 400 किसानों ने तुलसी रोपी थी लेकिन अबकी बार इनकी संख्या बढ़ गई।
उद्यान अधीक्षक भैरम सिंह के मुताबिक इस बार किसानों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। पिछले वर्ष करीब 600 हेक्टेयर में तुलसी लगाई गई थी लेकिन, इस बार यह रकबा करीब बीस फीसदी बढ़ गया।
बाहर की कई कंपनियां भी अपने स्तर पर इनका उत्पादन करा रही हैं। तुलसी की श्यामा एवं रामा प्रजाति की मांग सबसे अधिक है। तीन माह में इसकी फसल तैयार हो जाती है। इन दिनों जुलाई-सिंतबर के बीच फसल लगाई गई है।
बुंदेलखंड में रामा प्रजाति की तुलसी की बोवाई अधिक हो रही। तुलसी का पत्ता समेत बीज, जड़, तना काफी उपयोगी होता है, इसलिए व्यवसायी किसानों को पूरे पौधे का दाम देते हैं।
लागत के मुकाबले फायदा अधिक होने से किसान भी तुलसी लगाने में दिलचस्पी दिखाते हैं। अन्ना जानवर भी इस पौधे को नुकसान नहीं पहुंचाते, इस वजह से इनकी देखभाल की भी अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती।
इसी तरह अश्वगंधा, एलोवेरा एवं गिलोय का भी पिछले वर्ष के मुकाबले उत्पादन बढ़ गया है। इसी तरह मोंठ, चिरगांव में किसान पिपरमेंट अथवा मेंथा का भी व्यापक पैमाने पर उत्पादन कर रहे हैं।