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हर मुश्किल का समाधान है, सफलता का मंत्र भी, बात तो हिंदी के सम्मान की है

Wed, 05 Aug 2020 10:20 AM IST
झांसी ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, झांसी

सार

  • मातृभाषा को उसका कद दिलाने के लिए झांसी के युवा फिल्मकार, अभिनेता, संगीतप्रेमी आगे आए
  • वरदान साबित हुई हिंदी को लेकर अपने अनुभव साझा किए, युवाओं को संदेश दिया नहीं कोई विकल्प
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हिंदी: अपनों की भाषा, सपनों की भाषा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिंदी पर बात चली है तो दूर तलक जाएगी ही। अमर उजाला के अभियान 'हिंदी: अपनों की भाषा, सपनों की भाषा' के तहत युवा पीढ़ी से लेकर अपने-अपने क्षेत्र में स्थापित लोगों से इस विषय पर बात हुई तो पता चला कि कोई पहले माने या बाद में, हिंदी का दबदबा तो मानना ही पड़ता है। कोई क्षेत्र इससे अछूता नहीं है। 
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संगीत, कला, थिएटर से लेकर व्यावसायिक गवितिधियों तक हिंदी की जरूरत है, हर मुश्किल का समाधान और सफलता का मंत्र भी हिंदी है। बात तो उसके सम्मान की है। 

अमर उजाला की इस पहल पर झांसी के युवा फिल्मकार, अभिनेता, संगीतप्रेमी आगे आए हैं। उन्होंने न सिर्फ उनके लिए वरदान साबित हुई हिंदी को लेकर अपने अनुभव साझा किए, बल्कि समाज के हर वर्ग से मातृभाषा को भरपूर सम्मान देने की अपील की।
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मैंने तो मायानगरी में जाकर सीधे कहा, मुझसे तो हिंदी में बात करो: आरके गौरव
मूल रूप से झांसी के रहने वाले युवा अभिनेता आरके गौरव ने कहा कि हम लोग खुद ही हिंदी को कम महत्व देते हैं। जब वे अभिनय के सिलसिले में मुंबई गए तो वहां ज्यादातर बातचीत अंग्रेजी में होती थी। 

इस पर गौरव ने सभी से साफ कह दिया कि मुझसे हिंदी में बात करो। आखिरकार लोगों को हिंदी में बात करनी पड़ी। आत्मविश्वास से लबरेज गौरव ने बताया कि न उन्होंने कोई इंटरव्यू अंग्रेजी में दिया और न ऑडिशन। 

अंग्रेजी से न बहुत ज्यादा वास्ता है और न ख्वाहिश। हम जो भी हैं जैसे हैं आपके सामने हैं। हिंदी हमारी मातृभाषा है, हमारा मान है। मुंबई के नटरंग थिएटर में भी उन्होंने हिंदी में अभिनय किया, सभी से हिंदी में बात की। 

गौरव ने हिंदी फिल्म 'झूठा कहीं का' में भी अभिनय किया है। गौरव के अनुसार मायानगरी वाले बड़ी-बड़ी बातें भले ही अंग्रेजी में करें। अंत में उन्हें फिल्म का शीर्षक हिंदी में ढूंढना पड़ता है। ये उन्हें भी अच्छी तरह से पता है। वे हिंदी में ही कविताएं भी लिखते हैं।

अंग्रेजी एक्टर हिंदी में सही ढंग से डायलॉग नहीं बोले पाते: रवि रायकवार
आंतिया तालाब निवासी रवि रायकवार पिछले पांच वर्षों से थिएटर से जुड़े हैं। उन्होंने तुगलक, कोर्ट मार्शल आदि में अभिनय किया। जब मुंबई गए तो वहां की दुनिया अंग्रेजी बोलने वालों की मिली। 

हिंदी में बात करने वालों से सही ढंग से बात भी नहीं की जा रही थी। रवि ने बताया कि उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। सोचा, अभिनय हिंदी में करना है, डॉयलॉग हिंदी में बोलना है। ये अंग्रेजी बोलने वाले उस दौरान अंग्रेजी में तो बोलेंगे नहीं। 
 
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वही हुआ, उन अंग्रेजी दां लोगों से सही से डॉयलॉग तक नहीं बोले गए। हमें अपनी मातृभाषा पर गर्व करना होगा। उन्होंने बताया कि हिंदी भाषा में दो वेब फिल्में कर चुके हैं। जल्द ही एक बड़ी फिल्म अरबाज खान और प्रिया प्रकाश के साथ आने वाली है। 

उनका सपना है कि अरबाज खान के प्रोडक्शन की किसी हिंदी फिल्म की शूटिंग झांसी में हो। लोगों खास कर युवा पीढ़ी में संदेश जाए कि हिंदी सर्वश्रेष्ठ भाषा है।

मातृभाषा हिंदी से लगाव वैसे ही होना चाहिए, जैसे अपनी मां से: ऋषभ
सदर बाजार निवासी युवा अभिनेता ऋषभ शुक्ला सीधा सवाल करते हैं क्या हम अपनी मां से शर्मिंदा हो सकते हैं। नहीं न, तो फिर हम अपनी मातृभाषा से कैसे शर्मिंदा हो सकते हैं। आज युवा पीढ़ी का एक वर्ग ऐसा है जो सिर्फ अंग्रेजी के पीछे दीवाना है। 

अंग्रेजी सिर्फ एक माध्यम है। हिंदी एक विराट माध्यम, श्रेष्ठ भाषा, एक संस्कार, एक भाव है। इसका सम्मान, इससे लगाव ठीक वैसे ही होना चाहिए जैसे हमें हमारी मां से होता है। भारत में अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक सही ढंग से पहुंचाने का एकमात्र सशक्त माध्यम हिंदी ही है। 

ऋषभ अब तक कई हिंदी नाटक, शॉर्ट मूवीज, सब टीवी के शो तेनाली राम और एंड टीवीपर आने वाला कहत हनुमान जय श्री राम में भी नजर आ चुके हैं। जल्द ही वे एक वेब सीरीज में नजर आने वाले हैं। 

अंग्रेजी भले सीखिए अंग्रेजियत नहीं, जिंदगी हिंदी में ही जिएं
हिंदी और संगीत से विशेष स्नेह रखने वाले संजय श्रीवास्तव धर्मेश्वर के अनुसार हिंदी एक ऐसा माध्यम है जिसे आप सम्मान देंगे तो ये आपको पहचान, समृद्धि सब कुछ देगी। इसके पीछे वे कारण भी बताते हैं। 

उन्होंने बताया कि स्नातक विज्ञान से किया। इसके बाद अंग्रेजी की बारीकियों को समझने के लिए एक शोधार्थी के रूप में अंग्रेजी में एमए किया। पुस्तक मेले में जाकर खास पुस्तकें ढूंढीं ताकि अंग्रेजी साहित्य के तमाम पहलुओं को समझा जा सके। 

वहां की अच्छी बातों को ग्रहण किया। उन्होंने बताया कि इसके बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा और यही संदेश युवा पीढ़ी को देना चाहूंगा कि अंग्रेजी भले सीखिए, अंग्रेजियत नहीं जिंदगी तो हिंदी में ही जिएं। 

शास्त्रीय संगीत से भी उनका विशेष लगाव है।  इसलिए हिंदी में संगीत पर टेलिफिल्म और सीरियल भी बनाए। इसमें बनारस दूरदर्शन के लिए म्यूजिक मैजिक और कानपुर के सिटी केबल के लिए रसगुल्ले ठंडे-ठंडे बनाया। उन्होंने बताया कि संगीत को जन जन तक पहुंचाने में जो सामर्थ्य हिंदी में है वह किसी अन्य भाषा में नहीं।
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