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पटरियों पर घूम रहे अन्ना जानवर, 100 दिनों में ट्रेन की चपेट में आकर मरे 800

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झांसी। सड़क की तरह रेल पटरियों पर अन्ना जानवर खुलेआम घूम रहे हैं। यही कारण है कि पिछले 100 दिन में 800 जानवर (मवेशी) ट्रेन की चपेट में आकर अपनी जान गंवा चुके हैं। इन घटनाओं से हर बार रेल संचालन पर असर पड़ता है।
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सोमवार सुबह वाराणसी से ग्वालियर जाने वाली 01108 बुंदेलखंड एक्सप्रेस के इंजन से मऊरानीपुर व रानीपुर रोड स्टेशन के बीच किलोमीटर 1186/1 पर जानवर चपेट में आ गया। इस घटना के कारण चालक को ट्रेन मौके पर रोककर इंजन की जांच करनी पड़ी। सब ठीक मिलने के बाद ट्रेन आगे के लिए रवाना हो सकी। इससे ट्रेन 15 मिनट लेट हो गई। इसी तरह निजामुद्दीन से भुसावल जाने वाली 04064 गोंडवाना एक्सप्रेस से खजराहा व बबीना स्टेशन के बीच किलोमीटर नंबर 1207/2 पर, लोकमान्य तिलक से प्रयागराज जाने वाली 02129 तुलसी एक्सप्रेस से झांसी व ओरछा स्टेशन के बीच किलोमीटर नंबर 1137/4 पर, 09484 बरौनी अहमदाबाद एक्सप्रेस से टीकमगढ़ व उदयपुरा स्टेशन के बीच किलोमीटर नंबर 1073/4 व बदौसा स्टेशन के निकट किलोमीटर नंबर 1354/5 पर 02447 मानिकपुर खजुराहो निजामुद्दीन यूपी संपर्क क्रांति के इंजन की चपेट में आने से जानवर की मौत हो गई। अन्ना जानवर रेलवे के लिए भी बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। प्रशासन की तमाम कोशिशों के बाद भी संकट खत्म नहीं हो रहा है। गोशालाएं खाली हैं जबकि सड़कों पर अन्ना पशु देखे जा सकते हैं। मंडल में प्रतिदिन छह से दस जानवर इंजन की चपेट में आकर अपनी जान गंवा रहे हैं। पिछले 100 दिन में 800 से अधिक जानवर चपेट में आ चुके हैं। इन बढ़ती घटनाओं से आरपीएफ अफसर चिंतित हैं। जानवरों को पटरी के पास आने से रोकने के लिए नगर निगम और ग्राम पंचायतों की मदद ली जा रही है।
- पटरियों के निकट पशु न आएं इसके लिए लगातार जागरूकता अभियान चलाया जाता है। पटरियों के निकट पशु चराना एक अपराध है। मंडल में जहां जानवर कटने की ज्यादा घटनाएं ज्यादा हो रहीं हैं। उन जगहों को चिह्नित कर फैंसिंग कराने का काम चल रहा है।
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मनोज कुमार सिंह, जनसंपर्क अधिकारी।
कई सेक्शन बने डेंजर जोन
झांसी से ग्वालियर, झांसी से ललितपुर, झांसी से उरई, खजुराहो से टीकमगढ़ व झांसी से बांदा के रेल सेक्शन पिछले कुछ महीनों से डेंजर जोन बन गए हैं। इसका कारण यहां पटरियों पर घूमने वाले छुट्टा जानवर हैं। पटरियों के आसपास बेरिकेडिंग की व्यवस्था न होने से जानवर पटरी पर आ जाते हैं। इनमें अधिकांश वृद्ध जानवर होते हैं, जो अब किसान के लिए किसी काम के नहीं रहते हैं।
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