झांसी। झांसी एवं ललितपुर के प्राचीन जीर्णशीर्ण बावड़ियों (पुरातन जल स्रोत) के जीर्णोद्धार के लिए राज्य पुरातत्व विभाग ने उत्तर प्रदेश सरकार तथा क्षेत्रीय सांसद एवं केंद्रीय मंत्री उमा भारती से गुहार लगाई है। अधिकारियों के मुताबिक इनके जीर्णोद्धार से क्षेत्र का जल स्तर बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।
उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड क्षेत्र में कई प्राचीन बावड़ियां हैं, जो स्थापत्य कला की दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में इन बावड़ियों के संरक्षण व रखरखाव के लिए राज्य पुरातत्व विभाग ने पहल की है। इनमें ललितपुर के सतगता स्थित एक हजार वर्ष पुरानी बावड़ी को भी शामिल किया गया है।
बलुआ पत्थरों से निर्मित यह बावड़ी कलात्मक दृष्टि से काफी दुर्लभ है। इसी प्रकार मुगल कालीन दौर में निर्मित लगभग पांच सौ वर्ष पुरानी खनवारा की बाबड़ी भी शामिल है। इसके समीप मिले अवशेष किसी विकसित सभ्यता का अहसास कराते हैं। वहीं बालाबेहट किले में मौजूद बाबड़ी का भी जीर्णोद्धार कराने की योजना है। पुरातत्वविद मानते हैं कि यह बावड़ी झांसी के राजा गंगाधर राव द्वारा निर्मित कराई गई थी।
योजना में शामिल प्राचीन बावड़ियों के क्रम में खैलार की बावड़ी भी मुगल कालीन दौर की मानी जाती है। स्थापत्य कला के लिहाज से यह काफी महत्वपूर्ण है। पुरातत्व वेत्ताओं का मानना है कि दक्षिण की ओर कूच करते समय मुगल शासकों की शाही फौज इसका उपयोग करती रही होगी। वहीं कोछाभांवर-गढ़मऊ मार्ग पर स्थित अष्टकोणीय बावड़ी संरक्षण के अभाव में मलबे में तब्दील हो गई है। इसको भी योजना में शामिल किया गया है।
क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. एसके दुबे के मुताबिक इन बावड़ियों के संरक्षण के लिए विभाग ने उत्तर प्रदेश सरकार से मदद कीमांग की है, जिसकी कार्रवाई प्रगति पर है। वहीं क्षेत्रीय सांसद एवं केंद्रीय मंत्री उमा भारती से भी इनके रखरखाव के लिए गुहार लगाई गई है, जल्द ही उन्हें प्रोजेक्ट बनाकर भेजा जाएगा। उन्होंने बताया कि बावड़ियों के जीर्णोद्धार से क्षेत्र का जल स्तर भी बढ़ेगा।
12 महीने पानी से लबालब रहती थीं बावड़ियां
स्थापत्य कला की दृष्टि से समृद्ध बावड़ियों में समूचे 12 महीनों पानी की उपलब्धता के चलते पुराने दौर में राहगीर व शाही फ ौजें इनके पानी का इस्तेमाल करती थीं। इसके अलावा इन बावड़ियां में प्राकृतिक रूप से जल का संरक्षण होता था। लेकिन लोगों की लापरवाही व उदासीनता के चलते अब यह बावड़ियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। बावड़ियों के रखरखाव न हो पाने से क्षेत्रीय जल स्तर में भी गिरावट हुई है।