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मायानगरी तक पहुंची हिंदी के सम्मान की बात, आगे आए झांसी के फिल्मकार

Thu, 06 Aug 2020 11:03 PM IST
झांसी ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, झांसी
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हिंदी हैं हम - फोटो : Amar Ujala
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अमर उजाला की ‘हिंदी हैं हम’ मुहिम पर हिंदी प्रेमी मातृभाषा को उसका स्थान दिलाने के लिए आगे आ रहे हैं। कोई मुंबई से अपील कर रहा है, कुछ झांसी में ही अभियान छेड़ने की बात कर रहे हैं। वे खुद तो मातृभाषा के प्रति आभारी हैं ही, दूसरों से भी अपील कर रहे हैं कि वे हिंदी पर गर्व करें। साथ ही, यह सुझाव भी दे रहे हैं कि व्यक्ति के साथ ही समाज को भी नजरिया बदलना होगा। जब ऊंचे ओहदों पर बैठे लोग खुद पहल करें कि आप हिंदी में बात करें युवाओं और पूरे समाज का हौसला बढ़ेगा। मुंबई में काम कर रहे झांसी के रहने वाले फिल्मकार, अभिनेता आदि भी और सोशल मीडिया पर इस अभियान को खूब शेयर और अपील कर रहे हैं।
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हिंदी की बदौलत एक के बाद एक फिल्म, सीरियल मिलते गए: बृजेश मौर्य
मूलरूप से झांसी के नगरा निवासी बृजेश मौर्य के अुनसार हिंदी मेरे लिए वरदान है। किसी भी देश की पहचान अपनी भाषा से ही होती है। जब अति उत्साह के साथ किसी दूसरे देश की भाषा सीखते हैं तो भाषा के साथ ही वहां की संस्कृति के गुलाम हो जाते हैं। यही अंग्रेजी के साथ भी है। हम अंग्रेजों की तरह ही दिखना चाहते हैं, उनकी तरह ही बोलना और चलना चाहते हैं। इससे बनावटीपन आ जाता है।

मैं सरकारी स्कूल में हिंदी माध्यम का छात्र रहा हूं। झांसी में ही पला-बढ़ा, यहां पर ही तीन वर्ष अभिनय की शिक्षा ली। इसके बाद मुंबई का रुख किया। हिंदी पर अच्छी पकड़ ने वहां आत्मविश्वास बढ़ाया। सीरियल और फिल्म में मौका मिलता गया। भूमाफिया, क्राइम पेट्रोल के दस्तक और सतर्क सीरीज, सावधान इंडिया, मेरी हानिकारक बीवी, तेरा क्या होगा आलिया, मैडम सर में अभिनय किया। सीरियल मेरे साईं में लीड रोल किया। विज्ञापन फिल्म भी कीं। अमेजन प्राइम के लिए वेब सीरीज भी की है। अगले वर्ष फिल्म हमारी कहानी आ रही है। इसमें सेकंड लीड रोल निभा रहा हूं। इसमें सबसे बड़ा योगदान हिंदी का है। मैं सभी से कहना चाहूंगा, हिंदी पर गर्व करें।
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नजरिया व्यक्ति को बदलना होगा और समाज को भी: राज बच्चन
झांसी के रहने वाले राज बच्चन फिल्म निर्देशक हैं। उन्होंने कहा कि खुद लोगों को हिंदी का सम्मान करना सीखना होगा। इसके साथ ही ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों और सरकार को इसे कागजों की जगह व्यवहार में बढ़ावा देना होगा। अगर जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग अपने ऑफिस या टेबल पर पट्टी लिख कर बैठें ‘कृपया हिंदी में बात करें’ तो आधी समस्या तो खुद ब खुद दूर हो जाएगी। कहने का मतलब है हिंदी के प्रति नजरिया व्यक्ति को भी बदलना होगा और समाज को भी। मैं ठेठ हिंदी भाषी परिवेश से हूं। हिंदी की ही बदौलत मुझे मुंबई में काम मिलता चला गया।
कसौटी जिंदगी की, कहीं किसी रोज, क्यों की सास भी कभ बहू थी, विविधा, उजाले की ओर में सहायक निर्देशक की भूमिका निभाई। आल्हा ऊदल पर 52 एपिसोड बनाए। लोक संगीत पर कई हिंदी एल्बम बनाए। जिस सहजता से मैं हिंदी में काम कर लेता हूं मैं दूसरी भाषा में न तो कर सकता हूं और न मुझे मौका मिलेगा। यही बात में युवा साथियों से कहना चाहता हूं कि हिंदी भाषी होना पिछड़ेपन की नहीं गर्व की बात है। हिंदी को अपनी ताकत बनाएं।

गूगल अपने सर्च इंजन में हिंदी को सम्मान दे सकता है, हम क्यों नहीं: विभूति नारायण
मूलरूप से झांसी निवासी पटकथा लेखक विभूति नारायण उपाध्याय ने कहा कि हिंदी एक विशाल समुद्र है जिसमें हर भाव और रस समाहित है। ये वह तब कह रहे हैं जब उन्होंने अपने जीवन की लगभग पूरी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम में की है। फिल्मों और टीवी के लिए लिखते समय उन्होंने हिंदी की ताकत को पहचाना। समाज में बात को जितनी आसानी से और जितनी दूर तक हिंदी के द्वारा पहुंचाया जा सकता है उतना शायद किसी और भाषा में नहीं। ये विडंबना है कि आज भी हिंदी के लेखकों और कवियों को यथा उचित सम्मान मिलने में मुश्किल आती है। इसके बावजूद बदलाव आ रहा है।

हिंदी वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है। गर्व होता है जब गूगल अपने सर्च इंजन में हिंदी को सम्मानित स्थान देता है और हिंदी के कवि कुमार विश्वास और अशोक चक्रधर को मुख्यालय में आमंत्रित करता है। एमेजन हो या नेटफ्लिक्स सबको हिंदी कंटेंट की तलाश है। जब दूसरे देश और बहुराष्ट्रीय कंपनियां हिंदी का सम्मान करने को मजबूर हैं हमें तो भाव से मातृभाषा का सम्मान करना ही चाहिए। कहा, जल्द ही मेरा पहला हिंदी उपन्यास ‘फिदायीन’ आने वाला है। हिंदी की लगातार सेवा करता रहूंगा।

हम प्रतिज्ञा करें हिंदी को उपेक्षा के दलदल से निकालकर ही विश्राम लेंगे: राजीव शर्मा
हिंदी प्रेमी और पूर्व जिला प्रोबेशन अधिकारी राजीव शर्मा ने कहा आजादी के 73 वर्ष बीत जाने के बाद भी हिंदी को राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त नहीं हो सका है। राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त जी के संसदीय कार्यकाल में जब हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करने के लिए समय बढ़ाया जा रहा था तब स्वर्गीय गुप्त जी के नेतृत्व में पंडित बनारसी दास, सेठ गोविंद दास और दिनकर जी प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी से मिलने गए और उनसे समय बढ़ाने से रोकने का अनुरोध किया तब शास्त्री जी ने असमर्थता प्रकट की। स्वर्गीय गुप्त जी ने उनसे यही कहा ठीक है भइया हम तो जा रहे हैं, चले भी जाएंगे पर आने वाली पीढ़ी इसके लिए आपको क्षमा नहीं करेगी। आज पूरे विश्व में हिंदी का बोलबाला है।

हिंदुस्तान में लोकप्रियता की कसौटी हिंदी है। हिंदी ही ऐसी भाषा है जिसने पतित पावनी मां गंगा की तरह हर भाषाओं के प्रचलित शब्दों को अपने में समाहित कर लिया है। आइये हम प्रतिज्ञा करें कि अपनी मां हिंदी को उपेक्षा के दलदल से निकाल कर उसको सही स्थान दिलाकर ही विश्राम लेंगे।

राजीव शर्मा, सेवानिवृत्त - जिला प्रोबेशन अधिकारी - फोटो : REPORTERS

 

बृजेश मौर्य। - फोटो : DEHAT

 

राज बच्चन। - फोटो : DEHAT

 

विभूति नारायण।- फोटो : DEHAT

 

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