‘कक्काजी’ की राजनीति का मतलब देश प्रेम और जनसेवा
झांसी। बस ‘राजनीति’ शब्द ही नहीं बदला, बाकी इससे जुड़ी सारी चीजें बदल चुकी हैं। खासतौर पर नेताओं में बड़ा बदलाव आया है। देशहित से शुरू हुई वर्तमान राजनीति अब नेताओं की स्वार्थ सिद्धि के पड़ाव तक पहुंच चुकी है। उनके कामकाज का तरीका बदल गया है, चुनाव के पहले तक जनता के बीच में रहने वाले नेता पद मिलते ही दूरी बना लेेते हैं। हालांकि, लोगों के दिलों से उतरने में इन्हें वक्त भी नहीं लगता है। जबकि, हमारी पुरानी पीढ़ी के तमाम नेता अपनी मृत्यु के कई कई दशकों बाद भी लोगों के दिलों में बैठे हुए हैं। इन्हीं में से एक हैं झांसी के पहले सांसद आचार्य पं. रघुनाथ विनायक धुलेकर, जिन्हें आज भी लोग प्यार से ‘कक्का’ कहकर संबोधित करते हैं। वे तो अब नहीं हैं, लेकिन उनकी सादगी, देश प्रेम, जनसेवा को अब भी लोग याद करते हैं।
देश की आजादी के लिए आठ सालों तक जेल में रहे रघुनाथ विनायक धुलेकर 1952 में हुए देश के पहले आम चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर झांसी से सांसद बने थे। इसके बाद वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सभापति बनाए गए। इसके अलावा कई और पदों पर भी रहे, लेकिन वे कभी वाहन नहीं खरीद पाए। आने जाने के लिए वे सामान्य लोगों की तरह तांगे का इस्तेमाल करते थे, जिसमें उनके अलावा कई और सवारियां बैैैैैठी होती थीं। वे अपने इर्दगिर्द किसी तरह की सुरक्षा रखना पसंद नहीं करते थे। यहां तक कि उनका कोई पीए तक नहीं था। वे लोगों से सीधा संवाद रखते थे। नरसिंह राव टौरिया स्थित अपने घर पर बैठक के दरवाजे खोलकर बैठा करते थे। लोग समस्या लेकर आते रहते थे, किसी के लिए चिट्ठी लिख देते थे, तो किसी के साथ खुद चल पड़ते थे।
परिवार का पोषण भी था मुश्किल
कक्काजी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए ऑनर्स इंग्लिश और एलएलबी किया था। वे हाईकोर्ट के अधिवक्ता थे। क्रांतिकारियों और जरूरतमंदों के केस वे नि:शुल्क लड़ते थे। देश सेवा के कार्यों में व्यस्त होने के चलते वे ज्यादा समय पेशे को नहीं दे पाते थे। यहां तक कि वे अपने परिवार को पोषण करने की स्थिति में भी नहीं रहते थे। ऐसे में घर का खर्च उनके भाई बालकृष्ण धुलेकर उठाते थे, जो राजस्व विभाग में अफसर थे।
कुआं मेरा है, पर पानी नहीं
आचार्य धुलेकर के पौत्र निरंजन धुलेकर ने बताया कि उनके घर में कुआं है। ये कुआं कक्का ने सभी के लिए खोल रखा था। उनके घर का पानी भी इसी कुएं से आता था, बाहर के लोग भी वहीं से पानी भरते थे। कक्का कहते थे कि कुआं जरूर उनका है, लेकिन इसमें भरा पानी उनका नहीं है। ये कुदरत का है और कुदरत ने ये सभी के लिए दिया है।