सिकरारा। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सूर्यनाथ उपाध्याय की आठ जनवरी को पुण्यतिथि है। उन्होंने आजादी की लड़ाई में ऐसी ज्वाला भड़काई थी कि फिरंगी सरकार के सारे मंसूबे फीके पड़ गए। देश के लिए मर मिटने की उनकी लालसा ने उन्हें ऐसे सेनानी का स्थान दिलाया था, जो लंबे समय तक याद किया जाएगा। फिरंगी सरकार ने फरारी के दौरान सूर्यनाथ को गोली मारने का आदेश जारी किया था।
उनके छोटे बेटे अभयराज उपाध्याय, पौत्र संजय उपाध्याय, अनिल उपाध्याय आदि ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पूर्व विधायक सूर्यनाथ उपाध्याय का जन्म 16 जनवरी 1918 को देहजुरी गोपालपुर गांव में हुआ था। 20 वर्ष की आयु में वह आजादी की लड़ाई में कूदे और 1938 में ट्रेनिंग लेकर व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लिया। 18 मार्च 1941 को पहली बार गिरफ्तार हुए। नौ माह कठोर कारावास से भी उनका हौसला कम नहीं हुआ। चुनार जेल में रहते हुए क्रांतिकारी संगठन बनाया। संगठन ने 1942 के आंदोलन में अंग्रेजों का तख्त पलटने में मुख्य भूमिका निभाई थी। जेल से छूटने के बाद सिरसी, बरईपार के शिव मंदिर पर क्रांतिकारियों की बैठक में उन्हें कमांडर चुना गया। उनकी अगुवाई में मछलीशहर तहसील पर धावा बोला और सुजानगंज थाना लूट लिया। बौखलाई अंग्रेजी हुकूमत ने सूर्यनाथ को गोली मारने का हुक्म दिया। 16 अक्तूबर 1942 को कुल्हनामऊ में डाक लूटने के बाद गद्दारों के कारण सूर्यनाथ अपने साथियों बैजनाथ सिंह, दुखरन मौर्य, उदरेज सिंह, शिवव्रत सिंह सहित गिरफ्तार कर लिए गए।