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जरा इनसू पूछिए क्या है भय, भूख और बेबसी

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बसें न मिली तो लोगों ने मालवाहक के पीछे बैठकर की यात्रा। - फोटो : JAUNPUR
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जौनपुर। भय, भूख और बेबसी क्या होती है, यह जरा उन मजदूरों से पूछिए जो अपने सपनों का शहर छोड़कर पैदल ही घर के लिए निकल पड़े हैं। सैकड़ों किमी की दूरी तय करने के बाद उनके पैर जवाब दे रहे थे। वह थक के चूर थे, फिर भी आगे बढ़ने को मजबूर थे। रुकें भी तो कहां, कैसे, कब तक, जब हर कोई उन्हें संदेह की निगाह से ही देख रहा है। दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा में रहकर भरण-पोषण करने वाले यह मजदूर तीन-चार दिन पहले घर के लिए निकले थे। इनमें से कई रविवार को जौनपुर पहुंचे। उनके चेहरे की लकीरें राह की दुश्वारियां बयां कर रही थीं। भूख-प्यास से बेहाल डरे-सहमे यह युवक जल्दी से जल्दी अपने गांव और घर पहुंचने को व्याकुल दिखे। किसी को महराजगंज, देवरिया, कुशीनगर जाना था तो किसी की बनारस, चंदौली, बलिया और गाजीपुर थी। बावजूद वह आगे बढ़ते रहे।
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दिल्ली से घर के लिए पैदल चले दर्जन भर लोग रविवार को वाराणसी-जलालपुर हाईवे के बाईपास पर दिखाई दिए। यह सभी लोग बेलदारी का काम कर परिवार का भरण पोषण करते हैं। यह सभी वाराणसी और चंदौली जिले के निवासी हैं। कंधे पर बैग-झोला टांगे सभी तेजी से वाराणसी की ओर बढ़ रहे थे। पूछने पर बताया कि 750 किलोमीटर की दूरी को छह दिनों में तय किए हैं। जनता कर्फ्यू के एक दिन पूर्व ही मालिक ने काम बंद होने का हवाला देकर गांव जाने को कहा था। वह लोग कुछ समझ पाते कि अचानक देश लॉक डाउन हो गया। साधन मिलना संभव नहीं हो रहा था। रास्ते में कहीं-कहीं ट्रैक्टर चालक जहां तक जा रहे थे, वहां तक बैठा लेते रहे। इससे उनकी दूरी भले ही कम हो गई हो, लेकिन पेट में लगी भूख की आग कहीं नहीं मिटाई जा सकी। इन सभी लोगों को हाईवे पर रोककर अपराध निरोधक कमेटी के अध्यक्ष एजाज अहमद ने केला एवं अंगूर देकर आगे को भेजा गया।
दो दिन भूख-प्यास से तड़पे, तब मिला खाना
मुंगराबादशाहपुर। पीठ पर जरूरी सामानों का बैग, दिल में दर्द, आंखों में आंसू लिए मजदूर दिल्ली से पलायन कर पांचवें दिन भी पैदल घरों की तरफ जाते दिखे। पलायन की दुश्वारियों का जिक्र करते ही उनका दर्द छलक पड़ा। मूल रुप से कोल्हुआं महराजगंज के निवासी विवेक कुमार कहते हैं कि भूख-प्यास का दर्द कैसे होता है, हमसे बेहतर अब कोई नहीं जानता। दो दिन भूखे प्यासे तड़पे, तब कहीं जाकर भोजन नसीब हुआ। विवेक राजस्थान की एक कंपनी में काम करते हैं। अंबेडकरनगर के मालीपुर गांव निवासी अखिलेश, शशिकांत, रविकांत की भी यही कहानी है। तीनों युवक एक गांव के हैं। वह एक साथ ही दिल्ली में कार का गियर बनाने वाली कंपनी में काम करते थे। बताया कि लॉक डाउन के बाद कंपनी बंद हुई तो घर के लिए निकलने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। दिल्ली सरकार की ओर से लगाए गए शिविर में एक दिन भोजन कर पेट की आग बुझाई और फिर आगे बढ़ गए। दिल्ली से दो ट्रकों के सहारे प्रयागराज आए और अब पैदल ही घर ही ओर जा रहे हैं। पूरे रास्ते खाने पीने का अकाल रहा। कुछ पैसे थे वह भी खत्म हो गए हैं। वाहन न चलने से पैदल चलना मजबूरी है। कोई सहायता करने को तैयार नहीं है। रास्ते भर शक की नजर से देखा गया। न किसी ने पनाह न दी और न ही किसी ने तकलीफ पूछी।
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भूख से परेशान उत्तराखंड के माजिद व जीशान
बदलापुर। हरिद्वार उत्तराखंड का माजिद व जीशान लॉक डाउन के बाद से ही बदलापुर में भूख से तड़प रहे हैं। पास में फूटी कौड़ी भी नहीं है। यह दोनों यहां गांव-गांव में टहल कर कपड़े की फेरी करते हैं। रविवार को इस भरोसे में झोला लेकर किराए के मकान से उत्तराखंड के लिए निकल पड़े कि उन्हें सरकारी बस से उनके घर छोड़वाया जाएगा। दोनों सुबह दस बजे से ही शाम चार बजे तक बस स्टैंड बदलापुर पर खड़े रहे, लेकिन एक भी बस नही मिली। लाचार होकर दोनों फिर किराए के मकान में लौट गए। उन दोनों के घर वाले भी परेशान हैं। दिन भर फेरी करने के बाद ही उन्हें भोजन नसीब होता है। 22 मार्च से लागू लॉक डाउन के बाद से ही उनको भोजन के लाले पड़े हैं। माजिद व जीशान डॉ.अनिल सिंह की गली में विनय सिंह के मकान में किराएदार हैं।
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