व्रत विधान का विधान बताते हुए डॉ.टीपी त्रिपाठी कहते हैं कि व्रत के दिन स्नान आदि से निवृत होकर भगवान सूर्यनारायण की प्रतिमा को स्नान करा कर गंध,पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि से उनकी पूजा की जाती है।
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पुत्रवती महिलाएं अपने पुत्र के दीर्घायु होने के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत करती हैं। इस वर्ष यह व्रत 6 अक्टूबर शुक्रवार को होगा।
व्रत विधान का विधान बताते हुए डॉ.टीपी त्रिपाठी कहते हैं कि व्रत के दिन स्नान आदि से निवृत होकर भगवान सूर्यनारायण की प्रतिमा को स्नान करा कर गंध,पुष्प, अक्षत, धूप, दीप आदि से उनकी पूजा की जाती है। बाजरे व चने से बना भोग अर्पित किया जाता है। इस दिन स्त्रियां उड़द के कुछ साबुत दाने निगलती हैं जिसका प्रयोजन भगवान श्री कृष्ण के सूक्ष्म रूप को उदर में प्रवेश माना जाता है।कर्मकांड के विद्वान पं0मुरारी श्याम पांडेय के अनुसार इस दिन गेहूं तथा उड़द की दान का विशेष महत्व है। ब्राह्मण को भोजन भी कराया जाता है और उन्हें दान दक्षिणा देते है।व्रती महिलाएं अपने पुत्रों के गले में काले अथवा लाल रंग के रक्षा सूत्र या धागे को पहनाती है। 24 घंटे के उपवास के बाद दूसरे दिन ब्रह्म बेला में दही चूड़े का भोग लगाकर उसका कुछ भाग पशु पक्षियों को देने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं।