उत्तर प्रदेश के अति संवेदनशील जेलों में शामिल जौनपुर जिला जेल में क्षमता से तीन गुना बंदी है। करीब डेढ़ सौ साल पुरानी जेल में साढ़े तीन सौ बंदियों-कैदियों को रखने की क्षमता है, जबकि इसमें साढ़े 12 सौ से अधिक कैदी-बंदी रहते हैं। इन दिनों कोरोना संक्रमण के चलते सवा सौ बंदियों को अंतरिम जमानत पर छोड़ा गया है। करीब एक हजार बंदी अभी भी जेल में हैं। बंदीरक्षकों की संख्या पुराने मानकों के तहत ही है।
जौनपुर जिला जेल में शुक्रवार को बवाल अचानक नहीं हुआ है। जेल की व्यवस्था से असंतुष्ट बंदियों में महीनों से गुस्सा था। इसी साल जनवरी में भी उन्होंने जेल की व्यवस्था से नाराज होकर हंगामा किया था। जेल अफसरों के हस्तक्षेप से मामला जैसे-तैसे शांत हुआ था। तब कुछ बंदियों की जेल बदलकर जेल प्रशासन यह मान चुका था कि अब सब कुछ उनके नियंत्रण में है, लेकिन बंदियों में विद्रोह की चिंगारी बरकरार थी और मौका मिलते ही वह धधक उठी।
जेल के अंदर पिछले छह साल में तीन बार ऐसे मौके आए, जब बंदियों ने जेल प्रशासन के खिलाफ बगावत कर दी। हर बार उन्हें शांत कराने में पुलिस-प्रशासन के अफसरों को नाकों चने चबाने पड़े हैं। इसके पहले वर्ष 2015 में भी जेल में ऐसे ही उपद्रव हुआ था। तब महिला बंदी रक्षक से छेड़खानी के बाद बंदी रक्षकों की पिटाई से एक बंदी की मौत हो गई थी। तब उग्र बंदियों ने साढ़े पांच घंटे तक जेल को अपने कब्जे में रखा था। फोर्स को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।
जौनपुर जिला जेल में बवाल की शुरुआत शुक्रवार दोपहर लगभग ढाई बजे हो गई थी। जैसे ही कैदियों को बागेश मिश्र के मौत की खबर मिली वे उग्र हो गए। बाहर जेल अधीक्षक एसके पांडेय मीडिया को बाइट देते हुए बागेश की मौत में किसी तरह की लापरवाही से इनकार कर रहे थे। ठीक इसी वक्त जेल के अंदर बवाल की शुरुआत हो चुकी थी। कैदियों ने पहले हंगामा मचाया, फिर पथराव शुरू कर दिया। जेल प्रशासन ने पहले तो अपने स्तर से ही उनसे निपटने की कोशिश की, लेकिन मामला बिगड़ता दिखा तो पीएसी और पुलिस फोर्स की मदद दी गई। पगली घंटी बजते ही जेल के आसपास के इलाके में हड़कंप मच गया।