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विरासत पर संकट: बारादरी की गुंबदों में दरार, मकबरे की दीवारों पर नोना; गुम हो रही जौनपुर की शान

Sat, 22 Aug 2026 11:40 AM IST
Pragati Chand अंकुर शुक्ला, संवाद न्यूज एजेंसी, जौनपुर।

सार

जौनपुर के इतिहास की चमक फीकी पड़ रही है। ताजमहल से तुलना की जाने वाली कालिच खान की बारादरी के गुंबदों में मोटी दरारें हैं, शाही किला के पीछे की हिस्से की दीवार और शाही पुल के पत्थरों के बीच पेड़-पौधे उग आए हैं। 
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बारादरी की गुंबदों में दरार - फोटो : अमर उजाला
इतिहास में जिले की पहचान शर्की सल्तनत की राजधानी और अनूठी स्थापत्य कला के लिए दर्ज है। शहर में आज भी ऐसी कई इमारतें मौजूद हैं, जो बीते दौर की कला, तकनीक और वैभव की गवाही करती हैं। इन धरोहरों की मौजूदा तस्वीर इतिहास की उस चमक से बिल्कुल अलग है। ताजमहल से तुलना की जाने वाली कालिच खान की बारादरी के गुंबदों में मोटी दरारें हैं, शाही किला के पीछे की हिस्से की दीवार और शाही पुल के पत्थरों के बीच पेड़-पौधे उग आए हैं। झंझरी मस्जिद तक पहुंचने का रास्ता ही बदहाल है। संरक्षण के दावे और धरोहरों की जमीनी हालत के बीच बड़ा अंतर है।  
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बारादरी - फोटो : अमर उजाला
झंझरी मस्जिद जाने वाला रास्ता कच्चा
झंझरी मस्जिद तक जाने वाला रास्ता कच्चा है। बारिश के मौसम में जगह-जगह पानी भर जाता है। आसपास खंडहरनुमा अवशेष दिखाई दे रहे हैं। सदियों पुरानी यह मस्जिद उस दौर की अद्भुत स्थापत्य कला की मिसाल है, जब आधुनिक तकनीक सीमित थी। कारीगरों ने हथौड़े, छैनी और श्रम से इसे आकार दिया। इसकी मेहराबें, गोलाकार बनावट और मोटी पत्थर की दीवारें प्रकाश, ध्वनि और तापमान का अनोखा प्रभाव पैदा करती हैं। यह मस्जिद केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जौनपुर की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्थानीय नागरिक इसके संरक्षण और बेहतर पहुंच मार्ग की मांग करते रहे हैं। समय रहते वैज्ञानिक संरक्षण, सफाई और क्षेत्र का विकास किया जाए तो झंझरी मस्जिद सांस्कृतिक पर्यटन का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकती है।
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बारादरी - फोटो : अमर उजाला
फिरोज शाह तुगलक के मकबरा के बाहर लगा ताला
सिपाह क्षेत्र स्थित फिरोज शाह तुगलक के मकबरे की बदहाल स्थिति ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की चुनौती को उजागर करती है। मकबरे के चारों तरफ ताले लगे हैं। बाहरी दीवारों पर नमी के कारण नोना लगने लगा है। नियमित देखरेख के अभाव में स्मारक की संरचना को नुकसान पहुंच रहा है। पत्थरों की नक्काशी और गुंबददार संरचना वाला यह मकबरा मध्यकालीन स्थापत्य की महत्वपूर्ण विरासत है। समय रहते संरक्षण की ठोस कार्ययोजना बनाकर मकबरे की स्थिति सुधारने की पहल करनी चाहिए, ताकि यह धरोहर उपेक्षा की भेंट न चढ़े। आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।

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बारादरी - फोटो : अमर उजाला
शाही पुल में पेड़ों की जड़ों से बढ़ा खतरा
गोमती नदी पर स्थित ऐतिहासिक शाही पुल के पत्थरों और जोड़ों के बीच पेड़ व झाड़-झंखाड़ उगने से इसकी संरचना को खतरा बढ़ गया है। बढ़ती जड़ों के कारण पत्थरों की पकड़ ढीली होने और दरारें बढ़ने लगे हैं। करीब 450 साल पुराना शाही पुल जौनपुर की ऐतिहासिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में निर्मित यह पुल मजबूत पायों और मेहराबदार संरचना के लिए जाना जाता है। लोगों ने मांग की है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा पुल का विशेषज्ञों से निरीक्षण कराया जाए। पेड़ों को वैज्ञानिक तरीके से हटाने, सफाई और आवश्यक मरम्मत का काम जल्द शुरू किया जाए, ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर को संभावित नुकसान और हादसे के खतरे से बचाया जा सके।
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बारादरी - फोटो : अमर उजाला
बारादरी की ताजमहल से भी होती थी तुलना, आज खंडहर
कलीचाबाद के पास गोमती तट पर स्थित ऐतिहासिक कालिच खान का मकबरा संरक्षण के अभाव में जर्जर हो रहा है। बारादरी के नाम से प्रसिद्ध इस इमारत के गुंबदों में मोटी दरारें पड़ गई हैं। बारिश का पानी अंदर पहुंचने से छत और दीवारों को भी नुकसान हो रहा है। गुंबद पर घास उग आई है, जबकि लखौरिया ईंटों से बनी दीवारें भी कमजोर हो रही हैं। मुगलकालीन वास्तुशैली में बनी यह इमारत अपनी नक्काशी और बनावट के लिए जानी जाती है। इसकी वास्तु विशेषताओं की तुलना ताजमहल से भी की जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, 1628 से 1635 के बीच बनी इस इमारत में 12 दरवाजे और पांच कब्रें हैं, जिनमें कालिच खान, उनके दो पुत्रों और दो रिश्तेदारों की कब्रें शामिल हैं। बताया जाता है कि कालिच खान अकबर के समय सूरत के किले के किलेदार थे और शाहजहां के काल में उन्हें जनपद में भेजा गया था।
 

एक दिन पहले भी कुछ लोग आए थे वे भी समस्याएं बता रहे थे। फिलहाल, इस संबंध में पुरातत्व और पर्यटन विभाग से वार्ता की जाएगी, जो भी हो सकेगा उसे कराया जाएगा।
- सैमुअल पॉल एन, डीएम

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