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मानव देह में छिपा है एक चिरंतन आध्यात्मिक सत्य

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बरसठी। पूज्यपाद अनंतश्री विभूषित काशी धर्म पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणानंद तीर्थ महाराज ने कहा कि मनुष्य अपनी छिपी शक्तियों को पहचाने बिना शक्तिशाली नहीं बन सकता। मानव देह में एक चिरन्तन आध्यात्मिक सत्य छिपा हुआ है। जब तक वह मिल नहीं जाता इच्छाएं उसे इधर से उधर भटकाती है, दु:ख के थपेड़े खिलाती रहती हैं। सत्यामृत की प्राप्ति नहीं होती तब तक मनुष्य बार-बार जन्मता और मरता रहता है, न कोई इच्छा तृप्त होती है न आत्म सन्तोष होता है। जबकि मनुष्य की सारी क्रियाशक्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसी की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहती है। वह बरसठी के असवां रामपुर ग्राम के सिद्धनाथ बाबा सिद्धार्थश्रम में चल रहे श्रीमद्भागवत ज्ञानयज्ञ के तीसरे दिन भक्तों के प्रचवन कर रहे थे।
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उन्होंने कहा कि अपने आपको, अपनी चेतन सत्यता को पहचानना आसान बात नहीं है। विद्यमान परिस्थितियां ही धोखा देने के लिए पर्याप्त होती हैं। फिर जन्म जन्मान्तरों के प्रारब्ध इतने भले नहीं होते जो मनुष्य को साधारण ही क्षमाकर दें। हमारा असली व्यक्तित्व इतना स्पष्ट है कि उसकी भावानुभूति एक क्षण में हो जाती है। वह परदों में नहीं रहता फिर भी वह इतना जटिल और कामनाओं के परदों में छुपा हुआ है कि उसके असली स्वरूप को जानना टेढ़ा पड़ जाता है। साधना, उपासना करते हुए भी बार-बार पथ से विचलित होना पड़ता है। ऐसी असफलताएं ही जीवन लक्ष्य में बाधक हैं। श्रद्धा वह प्रकाश है जो आत्मा की, सत्य की प्राप्ति के लिए बनाएं गए मार्ग को दिखावा रहता है। जब भी मनुष्य एक क्षण के लिए लौकिक चमक-दमक, कामिनी और कंचन के लिए मोहग्रस्त होता है तो माता की तरह ठण्डे जल से मुंह धोकर जगा देने वाली शक्ति श्रद्धा ही होती है। सत्य के सद्गुण, ऐश्वर्य स्वरूप एवं ज्ञान की थाह अपनी बुद्धि से नहीं मिलती उसके प्रति सविनय प्रेम भावना विकसित होती है। उसी को श्रद्धा कहते हैं। श्रद्धा सत्य की सीमा तक साधक को साधे रहती है। श्रद्धा के बल पर ही मलिन चित्त अशुद्ध चिन्तन का परित्याग करके बार-बार परमात्मा के चिन्तन में लगा रहता है। बुद्धि भी जड़-पदार्थों में तन्मय न रहकर परमात्म ज्ञान में अधिक से अधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य भाव में बदल जाती है। मन का बोझ हलका हो जाता है। जिसकी जीवन पतवार परमात्मा के हाथ में हो उसे किसका भय सर्व शक्तिमान से संबंध स्थापित करते ही मनुष्य निर्भय हो जाता है। उसके स्पर्श से ही मनुष्य में अजय बल आ जाता है। इस अवसर पर आयोजक सोनू सिंह, विजय शंकर पांडेय, नंदलाल सिंह, भीम सिंह, अम्बिका प्रसाद पांडेय, विकास नन्दन मिश्र ने पादुका पूजन किया।
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