जौनपुर। कश्मीर की पहचान बनी केसर की खेती अब जिले में भी लहलहाने लगी है। मुफ्तीगंज के पठखौली गांव के किसान अनुज कुमार पाठक ने अपने कठिन परिश्रम और लगन की बदौलत इसे संभव कर दिखाया है। विनय ने डेढ़ एकड़ खेत में केसर की खेती की है। फसल में फूल आ गए हैं। मार्च के अंतिम सप्ताह तक फसल कट जाएगी। सब कुछ सही सलामत रहा तो यह फसल किसान को मालामाल कर देगी।
पठखौली गांव निवासी अनुज कुमार पाठक एस्सार आयल फील्ड सर्विस इंडिया लिमिटेड कंपनी में एचआर के पद पर तैनात हैं। मौजूदा समय में उनकी तैनाती गुजरात के भरुच शहर में है। अनुज कहते हैं कि उन्हें 28 दिन ड्यूटी करनी होती है और 28 दिन छुट्टी मिलती है। वह छुट्टी के दिनों में खेती बारी में ही बिताते हैं। व्यवसायिक खेती के लिए वह इंटरनेट पर तलाश कर रहे थे। तभी उन्हें महाराष्ट्र के जलगांव के किसान बालू गूजर का नंबर मिला। बालू ने केस की खेती की थी। वह उनसे मिलने जलगांव चले गए। खेती के बारे में जानकारी की और उसी किसान के माध्यम से लक्ष्मी एग्रो कंपनी से 1.80 लाख रुपये में तीन सौ ग्राम केसर के बीज ले आए। परिवार वाले भी उन्हें ऐसा रिस्क लेने से मना कर रहे थे बावजूद इसके वह अपनी जिद पर अड़े रहे और 20 अक्तूबर को इसकी डेढ़ एकड़ खेत में केसर की बुवाई की। करीब इतने ही खेत में अपने रिश्तेदार खानपुर गाजीपुर में बुवाई कराई है। खेत में लहलहा रही केसर की फसल में फूल आ गए हैं। मार्च के आखिरी सप्ताह तक फसल कटने लायक हो जाएगी। अनुज ने जिस अमेरिकन केसर की खेती की है उसकी बाजार में कीमत 90 हजार रुपये किलो है।
आनलाइन ट्रेडिंग कंपनी में कराया है रजिस्ट्रेशन
जौनपुर। विनय पाठक ने केसर की बिक्री के लिए आनलाइन ट्रेडिंग कंपनी इंडिया मार्ट में रजिस्ट्रेशन कराया है। इसी कंपनी के माध्यम से वह अपनी फसल को बेचेंगे।
बीस दिन लेट की बुवाई
जौनपुर। केसर की खेती करने वाले किसान अनुज कुमार का कहना है कि यह पहला मौका था जिससे बुवाई में करीब बीस दिन की देरी हो गई। पहली अक्तूबर तक इसकी बुवाई कर दिए होते तो इस वक्त फसल कटने लायक हो गई होती। यह तो संयोग है कि अभी रात में तापमान काफी कम हो जाता है जिससे फसल से उम्मीद बंधी है। केसर की खेती ठंडे प्रदेशों में होती है।
फसल देखने आ रहे लोग
जौनपुर। मुफ्तीगंज के पठकौली गांव में लहलहा रही केसर की खेती को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आ रहे हैं। जिले में कई किसान औषधीय खेती कर चुके हैं। आने वाले समय में केसर की खेती की ओर ही लोगों का झुकाव बढ़ सकता है।
क्या है केसर
जौनपुर। कृषि विज्ञान केंद्र के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डा. संदीप कुमार कहते हैं कि केसर एक सुगंध देनेवाला पौधा है। इसके पुष्प की वर्तिकाग्र को केसर, कुंकुम, जाफरान या सैफ्रान कहते हैं। यह इरिडेसी कुल की क्रोकस सैटाइवस नामक क्षुद्र वनस्पति है। जिसका मूल स्थान दक्षिण यूरोप है, यद्यपि इसकी खेती स्पेन, इटली, ग्रीस, तुर्किस्तान, ईरान, चीन तथा भारत में होती है। भारत में यह केवल जम्मू (किस्तवार) तथा कश्मीर (पामपुर) के सीमित क्षेत्रों में पैदा होती हैं। इसका उपयोग मक्खन आदि खाद्य द्रव्यों में वर्ण एवं स्वाद लाने के लिये किया जाता हैं। चिकित्सा में यह उष्ण, उत्तेजक, पाचक, वात-कफ-नाशक और वेदनास्थापक माना गया है।
केसर की खेती तराई इलाकों में कहीं कहीं किसान कर रहे हैं। लेकिन कशमीर और इरान जैसा उत्पादन पूर्वांचल में संभव नहीं लगता। पठखौली में किसान अनुज कुमार का प्रयोग सफल हुआ तो यह खेती किसानों के लिए बर्दान साबित हो सकती है। इस क्लाइमेट में कृषि वैज्ञानिकों ने अभी तक केसर कीक खेती का ट्रायल नहीं किया है।-डा. संदीप कुमार, फसल सुरक्षा वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र जौनपुर