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खुलने के बाद झोले में टंग जाता मौत का राज

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अपर पुलिस अधीक्षक डॉ अवधेश सिंह - फोटो : ORAI
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उरई। जिस विसरा रिपोर्ट के इंतजार में क्या वादी और क्या प्रतिवादी दोनों का इंतजार काटे नहीं कटता है, उस रिपोर्ट के आने के बाद उसकी एक प्रति को थानों में झोलों में टांग दिया जाता है। जिस कारण दोबारा विसरा रिपोर्ट की आवश्यकता पड़ने पर उसे तलाशना शायद पुलिस के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो, या फिर मान लिया जाता है कि रिपोर्ट की कभी दोबारा कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। फिलहाल हर थाने में कोई न कोई कोना ऐसा देखने को मिल जाएगा, जहां झोले में विसरा रिपोर्ट रद्दी की तरह भरी हुई मिल जाएंगी।
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बता दें कि संदिग्ध मौत के बाद अधिकांश मामलों में पोस्टमार्टम के दौरान मौत का कारण स्पष्ट न होने से उसका विसरा जांच के लिए भेजा जाता है। फिर रिपोर्ट के आने में इतना वक्त लग जाता है कि कई मर्तबा तो मामले में समझौता होने के बाद ही विसरा रिपोर्ट सामने आती है। हाल ही में कालपी में महिला के परिजनों ने उसकी मौत के बाद अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही का मामला तो दर्ज कराया लेकिन जब तक विसरा रिपोर्ट आई तब तक दोनों पक्षों में समझौता भी हो गया।
ऐसे मामलों में मरने वाले की मौत के राज का भी कोई मतलब नहीं रह जाता है। उससे भी ज्यादा हैरत की बात तो यह है कि थाने से जाने वाले विसरा की रिपोर्ट जब थाने ही लौटकर आती है तो उसकी एक प्रति को केस की फाइल में और दूसरी प्रति को एक झोले में डालकर टांग दिया जाता है। फिर एक पर एक इतनी रिपोर्ट झोले में पहुंच जाती है, कि यदि कभी किसी रिपोर्ट को तलाशना हो तो पसीने छूटना तय है। हालांकि समय-समय पर अधिकारी थानों का निरीक्षण करते हैं, जिसमें मालखाने से लेकर लंबित विवेचनाओं के रजिस्टर तक देखे जाते हैं, लेकिन उस वक्त भी विसरा रिपोर्ट का झोला अपने स्थान से टस से मस नहीं होता है।
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अपर पुलिस अधीक्षक डॉ अवधेश सिंह का कहना है कि प्रदेश में दो ही लैब है, जहां पर सभी जगहों से विसरा की रिपोर्ट भेजी जाती है, इसलिए भी देरी होना स्वाभाविक है, हालांकि पुलिस स्तर से समय समय पर लैब के अधिकारियों को विसरा रिपोर्ट जल्द भेजने के लिए पत्र लिखा जाता है और आगे भी कहा जाएगा। रही बात रिपोर्ट के झोलों में टांगे जाने की व्यवस्था का तो इसे भी अब निरीक्षण में शामिल कर इसमें सुधार कराया जाएगा।

कोतवाली में टंगा विसरा रिपोर्ट का झोला- फोटो : ORAI

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