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संसाधनों के पंख लगे तो मिले हौसलों को उड़ान

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निशानेबाजी करती रेशमा की फाइल फोटो - फोटो : ORAI
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उरई। टोक्यो में देश का नाम चमकाने वाली मीराबाई चानू और पीबी सिंधू की तरह जिले में भी प्रतिभाएं है। पर इन खेल प्रतिभाओं को संसाधनों के पंख नहीं मिल पाए, जिससे उनके हौसले खेल के आसमान पर उड़ान भी नहीं पा रहे हैं। हैरत की बात है कि जिस बुंदेलखंड के नाम रानी लक्ष्मीबाई का गौरवपूर्ण इतिहास दर्ज है। उसी बुंदेलखंड की बेटियों को आज अपनी खेल प्रतिभा को संवारने के लिए संसाधनों की कमी से जूझना पड़ रहा है। इन संसाधनों में खेल के मैदान से लेकर कोच और इंस्टीट्यूट तक की कमियां है। इस कारण जिले में खेल प्रतियोगिताएं भी स्कूल स्तर पर ही सीमित होकर रह गई है। कुछ ऐसी ही खेल प्रतिभाओं विशेषतौर पर महिला खिलाड़ियों की खेल कहानी सामने आई है, जिन्हें यदि संसाधन मिल जाए तो वे भी प्रदेश और देश में बुंदेलखंड की प्रतिभा को चमका सकती हैं।
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फोटो-13 ऊंची छलांग लगाती आशना (फाइल फोटो)।
फोटो-15 आशना।
फीस अधिक होने पर नहीं लगा सकी सफलता की छलांग
शहर स्थित वोहदपुरा की निवासी आशना यादव वर्तमान में बीपीएड की छात्रा है। एथलेक्टिस खिलाड़ी आशना ने बताया कि पिता रामसेवक आईटीआई के चतुर्थ श्रेणी कर्मी के पद से सेवानिवृत्त है। घर में चार बहनें है। इसके बाद भी उसने 2015 में एथलीट बनने की सोची और खेल के मैदान की ओर चल पड़ी। बताया कि उसने इंटर यूनिवर्सिटी में स्टेट मेडल पाया है। जबकि नेशनल जूनियर में भी हिस्सा लिया है। वर्ष 2018 में लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट फिजिकल एजूकेशन (एलएनआईपीई) में दाखिला लेने का प्रयास किया। पर 65 हजार रुपये फीस सुनकर पांव पीछे करने पड़ गए। जिले में करीब ढाई साल से कोई कोच नहीं है। वहीं डेढ़ साल से कोविड के कारण तो प्रैक्टिस लगभग बंद ही पड़ी है, सिर्फ दौड़ ही हो रही है।
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फोटो-14 शूटिंग कैंप में हिस्सा लेती रेशमा (फाइल फोटो)
फोटो-16 रेशमा।
बिना संसाधन लगाया नेशनल में निशाना
शहर के बजरिया निवासी रेशमा के पिता नूर खां पेशे से राज मिस्त्री हैं। ऐसे में उसका शूटिंग का शौक वाकई कठिनाई से भरा हुआ है। इसके बाद भी रेशमा ने शूटिंग की प्रैक्टिस और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना कैसे जारी रखा, यह वही जान सकती है। रेशमा के मुताबिक एनसीसी में कमांडर सीनियर अंडर आफिसर रह चुकी है। वर्ष 2018 में कानपुर में आयोजित टीएससी कैंप में हिस्सा लेकर शूुटिंग में मेडल जीता था। इसके बाद शाहजहांपुर में एक माह की ट्रेनिंग के बाद उसने दिल्ली में नेशनल भी खेला है, जहां उसे 65 हजार की किट भी मिल चुकी है। रेशमा का कहना है कि जिले में शूटिंग के लिए कोई संसाधन नहीं है। उसका सपना है कि इंदौर के कोचिंग सेंटर को ज्वाइन करें पर वहां की मंहगी फीस शायद इसे सपने से आगे ही न बढ़ने देगी।
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फोटो- 21 डीएम प्रियंका निरंजन
जिले में खेल प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिए 151 खेल के मैदान बनाए जाने हैं। जहां स्कूल कालेज स्तर के खिलाड़ी खेल सकेंगे। इसके अलावा जिले के इंदिरा स्टेडियम में भी खेल के संसाधन बढ़ाए जाएंगे। कुछ कोच भी रखने का प्रयास किया जाएगा, ताकि बुंदेलखंड की खेल प्रतिभाएं भी सामने आ सके।
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