‘बड़े लड़इया महुवे वाले, इनकी मार सही न जाए’ को उजागर करता ‘कजली मेला’ जो रक्षाबंधन के दूसरे दिन कोंच चौराहे के पास लगता है। शुक्रवार को यहां मेले की धूम रही।
बुंदेलखंड क्षेत्र में वर्षों से कजली पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता रहा है। दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान व महोबा के राजा परमाल के बीच हुए युद्ध के चलते बुंदेलखंड की बेटियां कजली
(भुजरियां) को रक्षा बंधन के दूसरे दिन सिरा सकी थीं। इस युद्ध में आल्हा व ऊदल ने अदम्य साहस दिखाते हुए पृथ्वीराज चौहान की सेना के दांत खट्टे कर दिए थे। इसलिए इस पूरे क्षेत्र में रक्षाबंधन के दूसरे दिन को विजय उत्सव के रूप में मनाया जाता है। नगर में मलंगा नाले के पास वर्षों से लगने वाले कजली मेले में हिंदू, मुस्लिम सहित राजनैतिक दलों के नेता,
साधु संत आदि मलंगा नाले के पास अपने-अपने स्टॉल लगाकर आने वाले लोगों से मिलते थे। एक दूसरे को कजली (भुजरियां) देकर रक्षा बंधन पर्व की बधाई देते थे। इसके बाद देर शाम
को कजली को मलंगा नाले में विसर्जित कर मेले का समापन किया जाता था। आज भले ही आधुनिकता की दौड़ तेज हो गई है फिर भी मेले को लेकर लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ है। शुक्रवार को पहले दिन मेले में खासी भीड़ उमड़ी।
पहलवानों ने दिखाए दांव पेंच
यमुना नदी के श्री ढोडे़श्वर घाट व पीला घाट पर मेला व दंगल का आयोजन हुआ। इसमें बड़ी संख्या में लोगों व महिलाओं की भीड़ उमड़ी। इस मौके पर आयोजित दंगल में पहलवानों ने खूब दांवपेंच दिखाए। वहीं, महिलाओं व बच्चों ने मेले में जमकर खरीदारी की। दोपहर से शुरू हुए मेले को लेकर बच्चों व महिलाओं मेें उत्साह देखा गया। महिलाओं ने भुजरियां भी
विसर्जित कीं। कजली मेले में नगर के अलावा आसपास के इलाकों के लोगों व महिलाओं ने हिस्सेदारी की। महिलाओं ने कजली को यमुना नदी में अर्पित कर एक दूसरे को कजली देकर रक्षाबंधन की शुभकामनाएं दी। यमुना तट के पास बने नरसिंह मन्दिर के प्रांगण मे महंत के देख रेख में दंगल का आयोजन हुआ जिसमे छोटे-छोटे पहलवानों व बच्चों ने कुश्ती लड़कर अपने दांव पेंच व हुनर दिखा मनोरंजन किया। सुरक्षा के लिए घाट पर पुलिस बल तैनात रहा।