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एकादशी से शुरू हो जाएंगे शुभ कार्य

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जालौन। हर साल कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन योग निद्रा में लीन जगत के पालनहार भगवान विष्णु चार माह बाद जागते हैं और सृष्टि के पालन का जिम्मा फिर से संभालते हैं। देव जागरण का दिन होने के कारण इस दिन को देवोत्थान एकादशी और प्रबोधनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इसी दिन से शादी-विवाह, मुंडन, सगाई आदि मांगलिक कार्यक्रम की भी शुरुआत हो जाती है।
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पं. अरविंद बाजपेई बताते हैं कि विवाह को सनातन धर्म में सोलह संस्कारों में से एक माना गया है। विवाह बंधन में बंधने के बाद वर और वधू दोनों का ही जीवन पूरी तरह से बदल जाता है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि विवाह पूरी तरह शुभ मुहूर्त को देखकर किया जाए। ताकि जीवन में कोई कष्टकारी स्थिति न पैदा हो। चतुर्मास के बाद देवोत्थान एकादशी से विवाह मुहूर्त की शुरूआत हो जाती है।
ज्योतिषाचार्य पं. देवेंद्र दीक्षित बताते हैं कि कार्तिक मास की एकादशी को देवोत्थान एकादशी मनाई जाती है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी के दिन श्रीहरि सो जाते हैं और फिर चार मास बाद यानी कार्तिक मास की एकादशी को निद्रा से श्रीहरि जागते हैं। यही कारण है कि इन चार महीनों में मांगलिक कार्यक्रम नहीं होते हैं। इस दिन तुलसी सालिकराम विवाह भी होता हैं। ज्योतिष के अनुसार शादियों में शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। विवाह यदि शुभ योग में हो तो उसके परिणाम भी बेहतर और समृद्धिकारक होते हैं। विवाह जैसे शुभ कार्य केवल गुण मिलान से ही नहीं, वरन अच्छी तरह पत्रिका, ग्रह मिलान कर ही करना चाहिए एवं शुभ मुहूर्त से ही होने चाहिए।
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अक्षय नवमी आज
कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन अक्षय नवमी मनाई जाती है बुंदेलखंड में इसे इच्छा नवमी भी कहते हैं। माना जाता है इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य अक्षय फल देने वाला होता है। अर्थात उसके शुभ फल में कभी कमी नहीं आती। जिले में अक्षय नवमी का पर्व शनिवार को मनाया जाएगा। आयुर्वेद में आंवला को आयु और आरोग्यवर्धक कहा गया है। इस दिन आंवला के वृक्ष की पूजा करके उसके नीचे बैठकर भोजन करने का भी बड़ा महत्व है।
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