जिले में पानी के अभाव में फसल सूख रही है। इसे देखकर किसान अपनी किसमत पर
आंसू बहा रहे हैं। सरकारें केवल वादा हवा में कर रही हैं। जमीनी हकीकत पर
अभी भी नहराें में धूल उड़ रही है। यही कारण है कि सूखे का सदमा लगातार
किसानों की जान ले रहा है। रविवार की शाम जिले के रामपुरा थाना क्षेत्र के
गांव भिटौरा में एक और किसान का दम सूखी फसल के सदमे में निकल गया।
परिजनाें ने शव का अंतिम संस्कार कर दिया है। पुलिस का कहना है कि उनके पास
कोई जानकारी नहीं है। रामपुरा थाना क्षेत्र के गांव भिटौरा निवासी किसान
अवध शुक्ला (45) पुत्र रामप्रकाश के पास पांच बीघा जमीन है। बारिश न होने
की वजह से वह तीन बीघा फसल की बुवाई नहीं कर पाया था। मात्र दो बीघा जमीन
में
उसने गंहूं की फसल की थी। सिंचाई के लिए पानी से उसकी गेहूं की फसल भी
सूख रही है। परिजनाें के मुताबिक वह इससे काफी परेशान हो गया और दो दिन से
खाना पीना नहीं खा रहा था। रविवार की देर रात उसने सीने में दर्द की
शिकायत
की। परिजन उसे अस्पताल ला रहे थे तभी रास्ते में उसकी मौत हो गई। परिजनाें
ने पुलिस को बिना सूचना दिए शव का अंतिम संस्कार कर दिया। इस बावत
थानाध्यक्ष राजा भईया ने बताया कि पुलिस के पास कोई सूचना देने नहीं आया है
लेकिन सूत्रों से पता चला है कि किसी किसान की मौत हुई है।
चौदह दिन में छह किसानाें की मौत
दस
साल से प्राकृतिक आपदाआें से जूझ रहे बुंदेलखंड के किसानाें का दर्द कम
होने का नाम नहीं ले रहा है। वर्ष 2016 तो किसानाें के लिए सबसे स्याह वर्ष
साबित हो रहा है। अन्नदाता को खाने तक के लाले पड़े हैं लकिन सरकार व
प्रशासन किसानाें की सुध नहीं ले रहा है। फसल सूख रही है और नहराें में
पानी नहीं आ रहा है। इससे बुंदेलखंड का किसान टूट चुका है। बीते 15 दिनाें
में छह किसानाें की या तो सदमे से मौत हुई है या फिर उन्हाेंने आत्महत्या
की
है। ऐसे में सवाल यह है कि किसानाें को इमदाद कब मिलेगी जब उनका सब लुट
जाएगा। 14 फरवरी को काबिलपुरा निवासी रामगोपाल की खेत में ही सदमे से मौत
हो गई थी। इसी तरह 16 फरवरी को कोटरा निवासी ब्रजमोहन की फसल
सूखने के सदमे
से मौत हो गई थी। 20 फरवरी को कदौरा के दयाशंकर ने खराब फसल देखकर फांसी
लगा ली। 26 फरवरी को कुठौंद के किसान लाल सिंह की भी सदमे से मौत हो गई। 27
फरवरी को एट के पिरौना निवासी लल्लू राम ने भी कर्ज
न चुका पाने के कारण
फांसी लगा ली। ये तो वे मामले हैं जो प्रकाश में आए हैं। कई ऐसे मामले भी
होंगे जिनकी जानकारी नहीं हो पाती है। इस सबके बाद भी इनकी मौत को प्रशासन
सदमे से नहीं मानता। इस कारण इनके परिजनों को सहायता भी नहीं मिल पा रही
है।