इस सेनेटरी पैड को ‘दिशा’ नाम दिया गया है। ट्रेनर अलका ने बताया कि इसे बनाने के लिए रुई धुनने के बाद उसे आकार देने के लिए सांचे में ढाला जाता है। फिर मजबूती के लिए पैड पर बैक लेयर लगाई जाती है। सिलाई करने के बाद स्टीकर लगाया जाता है। फाइनल पैंकिंग से पहले पैड को स्टरलाइज भी किया जाता है।
ये महिलाएं हैं मिसाल
अनीता, खुशबू, रीतू, नीतू, शकुंतला, अनीता, नीरज, पूनम, संगीता, सरिता, गुड़िया, संजू, ममता, पिंकी और ट्रेनर अलका।
संतोष कुमार तिवारी, निरीक्षक, जिला पंचायत उद्योग विभाग ने बताया कि, सरकार की मदद से इस सफर की शुरुआत हुई। धीरे-धीरे महिलाओं में जागरूकता आई और उन्होंने इसे स्वरोजगार बना लिया। एक दिन में 3000 हजार पैड तैयार होते हैं। इन्हें आशा बहुओं के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं तक भेजने की व्यवस्था बनाई गई है।